
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, जिसे आधुनिक सुविधाओं और सुरक्षित जीवनशैली के लिए स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने का दावा किया गया था, आज आवारा पशुओं की समस्या से जूझ रही है। हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया, जिसमें सांडों ने दादा-पोते पर हमला कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया।
समस्या का आधार
जब किसी शहर की सड़कों पर आम नागरिक निश्चिंत होकर न चल सकें, तो स्मार्ट सिटी का सपना अधूरा प्रतीत होता है। प्रशासन बार-बार यह दावा करता रहा है कि छुट्टा पशुओं को पकड़ने और उनकी देखभाल के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। आए दिन ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं जिनमें राह चलते लोग पशुओं के हमले का शिकार हो जाते हैं।
आम जनता की चिंता
यह समस्या केवल लखनऊ तक सीमित नहीं है। प्रदेश के छोटे-बड़े शहरों और गाँवों में भी लोग इसी मुसीबत से परेशान हैं। बच्चे, महिलाएँ और बुज़ुर्ग सबसे अधिक असुरक्षित महसूस करते हैं। कई बार ऐसे हादसों में लोग गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं, वहीं कुछ घटनाएँ जानलेवा साबित होती हैं।
राजनीति और जिम्मेदारी
इस घटना को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सवाल उठाया कि “जब राजधानी में ही नागरिक सुरक्षित नहीं हैं, तो बाकी प्रदेश की हालत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है।” विपक्ष का आरोप है कि सरकार केवल योजनाओं का प्रचार करती है, जबकि जमीनी स्तर पर नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते।
समाधान की दिशा
- छुट्टा पशुओं के लिए पर्याप्त और व्यवस्थित गौशालाओं का निर्माण ज़रूरी है।
- नगर निगम और प्रशासन को मिलकर इस समस्या पर ठोस रणनीति लागू करनी चाहिए।
- आधुनिक तकनीक और ट्रैकिंग सिस्टम से पशुओं की पहचान और निगरानी की जा सकती है।
- नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त नियम और त्वरित कार्रवाई आवश्यक है।
निष्कर्ष
लखनऊ जैसी राजधानी में यदि लोग सड़कों पर चलते समय आवारा पशुओं के डर से सहमे रहें, तो यह प्रशासन की नाकामी को दर्शाता है। स्मार्ट सिटी का असली मायना सिर्फ़ सुंदर सड़कें और चमचमाती रोशनी नहीं, बल्कि नागरिकों को सुरक्षित और सुविधाजनक वातावरण उपलब्ध कराना भी है।