
यरुशलम के पूर्वी हिस्से में हुए हालिया आतंकी हमले ने पूरे क्षेत्र के साथ-साथ वैश्विक समुदाय को भी हिला दिया। इस त्रासदी पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पीड़ितों के प्रति संवेदना जताते हुए हिब्रू भाषा में अपना संदेश साझा किया। यह कदम न केवल कूटनीतिक पहल था, बल्कि मानवीय जुड़ाव का भी प्रतीक बना।
🕊️ भाषा और संवेदना का संदेश
मैक्रों द्वारा हिब्रू भाषा में लिखी गई पंक्तियां इस बात का प्रमाण हैं कि मानवीय दर्द सीमाओं और संस्कृतियों से परे होता है। उनका संदेश था:
“फ्रांस इस जघन्य हमले की कड़ी निंदा करता है। हम पीड़ित परिवारों और पूरे इज़रायली समाज के साथ खड़े हैं।”
यह बयान केवल राजनीतिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि एक गहरे भावनात्मक संबंध और सहानुभूति की झलक भी था।
🛡️ साझा दुश्मन – आतंकवाद
फ्रांस स्वयं कई बार आतंकवादी हमलों का शिकार हो चुका है। यही कारण है कि मैक्रों ने इज़रायल के साथ एकजुटता जताते हुए यह स्पष्ट किया कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई वैश्विक स्तर पर मिलकर ही लड़ी जा सकती है। इस दृष्टिकोण से फ्रांस ने लोकतांत्रिक राष्ट्रों को एक साझा मोर्चा बनाने की दिशा में प्रोत्साहित किया।
🤝 कूटनीति और शांति की राह
अपने संदेश में मैक्रों ने यह भी रेखांकित किया कि स्थायी समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं, बल्कि संवाद, कूटनीति और परस्पर सम्मान से ही संभव है। यह विचार पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि सुरक्षा और न्याय के साथ-साथ शांति स्थापना भी समान रूप से आवश्यक है।
🌍 भारत के लिए प्रासंगिकता
भारत दशकों से आतंकवाद का सामना कर रहा है। ऐसे में फ्रांस की इस प्रतिक्रिया से भारत को यह सीख मिलती है कि कूटनीतिक संतुलन, संवेदनशीलता और सहयोग ही दीर्घकालिक रणनीति की कुंजी हैं। साथ ही, यह भारत की मध्य-पूर्व नीति को और मजबूत करने का अवसर भी प्रदान करता है।
📌 निष्कर्ष
मैक्रों की यह प्रतिक्रिया केवल एक संवेदना संदेश नहीं, बल्कि आधुनिक नेतृत्व की उस जिम्मेदारी को दर्शाती है जिसमें मानवीय संवेदनशीलता और वैश्विक सहयोग सबसे अहम हैं। यह स्पष्ट करता है कि आतंकवाद से जंग केवल हथियारों से नहीं, बल्कि साझी प्रतिबद्धता, संवाद और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता से जीती जा सकती है।