
तकनीकी विकास और वैश्विक सहयोग के दौर में भी दुनिया का एक बड़ा हिस्सा ऐसी सच्चाई झेल रहा है, जहाँ मासूम बच्चों के लिए स्कूल की दहलीज पार करना मौत से खेलने जैसा है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने एक संदेश में यह सवाल उठाया:
“क्या केवल पढ़ाई के लिए किसी बच्चे की जान खतरे में पड़नी चाहिए?”
📖 शिक्षा: मौलिक अधिकार या जंग का शिकार?
शिक्षा हर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन युद्धग्रस्त इलाकों में यह अधिकार एक संघर्ष बन गया है।
- स्कूल भवनों को निशाना बनाया जाता है।
- शिक्षकों पर हमले या अपहरण होते हैं।
- बच्चों को बाल सैनिक बनाने के लिए जबरन भर्ती किया जाता है।
- विस्थापन और मानसिक तनाव उनकी पढ़ाई छीन लेते हैं।
ये हालात आने वाली पीढ़ियों को अंधकार और निराशा की ओर धकेल रहे हैं।
📊 भयावह आँकड़े
संयुक्त राष्ट्र और यूनिसेफ की ताज़ा रिपोर्टें बताती हैं:
- हर साल लाखों बच्चे हथियारबंद झगड़ों के कारण स्कूल छोड़ने पर मजबूर होते हैं।
- कई देशों में स्कूलों को सैनिक अड्डों के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
- लड़कियों की शिक्षा सबसे ज्यादा प्रभावित होती है, जिससे असमानता और गहराती है।
🛡️ समाधान के रास्ते
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद ज़रूरी है:
- संघर्ष क्षेत्रों में स्कूलों को “सुरक्षित क्षेत्र” घोषित किया जाए।
- बच्चों की सुरक्षा को वैश्विक कानूनों में और सख्ती से लागू किया जाए।
- स्थानीय समुदायों को शिक्षा पुनर्निर्माण में शामिल किया जाए।
- डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए ताकि पढ़ाई बाधित न हो।
🇮🇳 भारत की ज़िम्मेदारी
भारत जैसे देश इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं:
- संयुक्त राष्ट्र मंचों पर बच्चों की शिक्षा की सुरक्षा पर ज़ोर देना।
- युद्धग्रस्त देशों को मानवीय सहायता और शिक्षा संसाधन उपलब्ध कराना।
- अपने अनुभवों और सफलताओं से अन्य राष्ट्रों को प्रेरित करना।
🔚 निष्कर्ष
जब कोई बच्चा स्कूल जाने से पहले यह सोचने पर मजबूर हो कि वह सुरक्षित घर लौट पाएगा या नहीं, तो यह पूरी मानवता की विफलता है।
हमें मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा कभी भी संघर्ष का शिकार न बने, बल्कि वह शांति और भविष्य निर्माण का आधार बने।