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महोबा में प्रधानाध्यापक की आत्महत्या: टीईटी अनिवार्यता पर गहराया विवाद


महोबा (उत्तर प्रदेश) – कबरई ब्लॉक के प्रेम नगर स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय में तैनात प्रधानाध्यापक मनोज कुमार साहू (49 वर्ष) की आत्महत्या ने शिक्षा जगत में गहरी हलचल पैदा कर दी है। 8 सितंबर 2025 को घटी इस घटना के बाद से प्रदेशभर के शिक्षक असमंजस और आक्रोश में हैं। प्राथमिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश, जिसमें पाँच वर्ष से अधिक सेवा शेष रहने वाले सभी शिक्षकों के लिए टीईटी परीक्षा पास करना अनिवार्य किया गया है, ने साहू को मानसिक दबाव में डाल दिया था।

घटना का सिलसिला

मनोज साहू की नियुक्ति करीब तीन दशक पहले 1992-93 में पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा आधार पर हुई थी। वे बीटीसी और इंटरमीडिएट उत्तीर्ण थे तथा वर्षों से शिक्षा विभाग में सेवाएँ दे रहे थे।
घटना वाले दिन सुबह उन्होंने पत्नी से कहा कि वे टहलने जा रहे हैं और घर की ऊपरी मंज़िल पर चले गए। देर तक वापस न आने पर परिवार ने दरवाज़ा खोला तो वे फांसी पर लटके मिले। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया।

तनाव की वजह

करीबी सहकर्मियों और रिश्तेदारों के मुताबिक, साहू पिछले कुछ दिनों से गहरे तनाव में थे। उन्हें आशंका थी कि यदि वे टीईटी पास नहीं कर पाए तो उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है। आत्महत्या से कुछ समय पहले उन्होंने अपने शिक्षकों के व्हाट्सऐप समूह में केवल “गुड मॉर्निंग” संदेश भेजा था, जो अब उनकी आख़िरी निशानी बन गया है।

शिक्षकों का गुस्सा और संघ का बयान

इस घटना ने शिक्षकों के बीच गुस्सा और चिंता दोनों को जन्म दिया है। कई शिक्षकों का मानना है कि दशकों तक सेवा करने के बाद अचानक परीक्षा थोपना न्यायसंगत नहीं है। शिक्षक संघों ने घटना पर शोक जताते हुए कहा कि वे इस आदेश के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगे और शिक्षकों को आत्महत्या जैसे कदम न उठाने की अपील भी की।

प्रशासन की भूमिका

पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराया है और मामले की जांच जारी है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि आत्महत्या के पीछे कई कारण हो सकते हैं, इसलिए अभी किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाज़ी होगी। वहीं, शिक्षा विभाग ने भी घटना को गंभीरता से लिया है और स्थिति पर नज़र रखी जा रही है।


निष्कर्ष

महोबा की यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि शिक्षा नीति पर बड़ा सवाल भी खड़ा करती है। लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों पर अचानक नई शर्तें लागू करना क्या उचित है? यह मुद्दा अब न केवल शिक्षक समुदाय बल्कि सरकार और न्यायपालिका के लिए भी गंभीर मंथन का विषय बन गया है।


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