
यूक्रेन और रूस के बीच जारी युद्ध एक बार फिर मासूम नागरिकों की जान ले गया। डोनेट्स्क क्षेत्र के यारोवा गांव में रूस द्वारा किए गए हालिया हवाई हमले ने दर्जनों परिवारों को मातम में डूबो दिया। जानकारी के अनुसार, यह हमला तब हुआ जब ग्रामीण अपनी पेंशन लेने के लिए इकट्ठा हुए थे। इसी दौरान रूस ने एक ग्लाइड बम से हमला किया, जिसमें कम से कम 24 लोग मारे गए और 19 गंभीर रूप से घायल हुए।
ज़ेलेन्स्की की तीखी प्रतिक्रिया
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेन्स्की ने इस घटना को “भयानक और अमानवीय” बताते हुए कहा कि रूस लगातार नागरिकों को निशाना बना रहा है, लेकिन इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं दिख रही। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रूस पर कड़ा दबाव और निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो यह हमला और भी गंभीर रूप ले सकता है।
ज़ेलेन्स्की ने अपनी अपील में साफ कहा —
“जब तक रूस की अर्थव्यवस्था और शासन को हर हमले के बाद दर्द महसूस नहीं होगा, तब तक पुतिन इसे अपनी खुली छूट समझते रहेंगे।”
मासूमों की मौत और वैश्विक चुप्पी
यह हमला सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि उन साधारण लोगों पर वार है जो अपनी बुढ़ापे की जिंदगी को पेंशन से चलाते हैं। सवाल यह है कि ऐसे निर्दयी हमलों पर दुनिया का मौन आखिर क्यों? क्या मानवाधिकारों की रक्षा सिर्फ बयानबाजी तक सीमित है?
निष्कर्ष
यारोवा गांव की यह त्रासदी एक सख्त संदेश देती है — युद्ध सिर्फ सैनिकों की लड़ाई नहीं, बल्कि निर्दोषों की बलि भी बनता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अगर अब भी चुप रहा तो आने वाले दिनों में यह हिंसा और भी विकराल रूप ले सकती है। मानवता के इस संकट पर ठोस और त्वरित वैश्विक हस्तक्षेप की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।