
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनैतिक नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उन निर्भीक क्रांतिकारियों के रक्त, साहस और बलिदान से भी आलोकित है जिन्होंने देश को आज़ाद करने के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। ऐसे ही अमर सेनानियों में से एक थे जतिन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, जिन्हें पूरा देश “बाघा जतिन” कहकर सम्मानित करता है। उनका जीवन राष्ट्रप्रेम और अदम्य साहस का अनुपम उदाहरण है।
जन्म और बाल्यकाल
जतिन्द्रनाथ का जन्म 7 दिसंबर 1879 को वर्तमान बांग्लादेश के कुश्तिया ज़िले के कायाग्राम गाँव में हुआ। बचपन से ही वे तेजस्वी, दयालु और निर्भीक व्यक्तित्व के धनी थे। शिक्षा के दौरान उनमें गहरी देशभक्ति की भावना जागृत हुई और वे सामाजिक कार्यों तथा जनसेवा में सक्रिय रहने लगे।
“बाघा” की उपाधि की घटना
जतिन को “बाघा” नाम तब मिला जब उन्होंने निहत्थे होकर एक खूंखार बाघ का सामना किया। घोर संघर्ष के बाद उन्होंने उस बाघ को मार गिराया। इस घटना में वे गंभीर रूप से घायल हुए, परंतु उनके अदम्य साहस और वीरता ने उन्हें “बाघा जतिन” के रूप में अमर कर दिया। यह उपाधि आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गई।
क्रांतिकारी जीवन
युवावस्था में ही जतिन ने ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया और युगांतर दल से जुड़ गए। वे हथियार जुटाने, युवाओं को प्रशिक्षित करने और संगठन को मजबूत बनाने में अग्रणी रहे।
उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण “जर्मन प्लॉट” था, जिसके तहत जर्मनी से हथियार मंगाकर अंग्रेज़ों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सशस्त्र विद्रोह करने की योजना बनाई गई। जतिन का स्पष्ट मत था कि केवल वार्ता से स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, इसके लिए साहस, संघर्ष और बलिदान आवश्यक है।
अंतिम संघर्ष और बलिदान
9 सितंबर 1915 को ओडिशा के बलसोर ज़िले के चाशीपुर गाँव में ब्रिटिश सेना ने जतिन और उनके साथियों को घेर लिया। घंटों तक चली भयंकर मुठभेड़ में उन्होंने अतुलनीय शौर्य का प्रदर्शन किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अंत तक डटे रहे और अंग्रेज़ों को चुनौती देते रहे।
आख़िरकार 10 सितंबर 1915 को उन्होंने वीरगति प्राप्त की और सदा के लिए अमर हो गए।
निष्कर्ष
बाघा जतिन केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे युवाओं के लिए साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन गए। उनका जीवन संदेश देता है कि सच्चा स्वतंत्रता संग्राम केवल तलवार या बंदूक से नहीं, बल्कि अदम्य विश्वास और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण से लड़ा जाता है।