
भारतीय विश्वविद्यालयों में कुलपति केवल प्रशासनिक प्रमुख नहीं होते, बल्कि वे संस्थान की शैक्षणिक दिशा, शोध कार्यों की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के भविष्य की दिशा तय करने वाले प्रमुख स्तंभ होते हैं। ऐसे में कुलपति नियुक्ति की प्रक्रिया जितनी निष्पक्ष और पारदर्शी होगी, उतना ही उच्च शिक्षा का भविष्य मजबूत होगा।
हाल ही में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को उठाकर बहस को और गहरा कर दिया है। उनका आरोप है कि जिन लोगों पर पहले पक्षपात और अनियमितता के आरोप लगे थे, वही अब नए कुलपतियों के चयन का जिम्मा संभाल रहे हैं। यह न केवल नैतिक चुनौती है, बल्कि शिक्षा जगत में व्याप्त ढांचागत कमजोरियों को भी उजागर करता है।
🔎 चयन प्रक्रिया की मौजूदा तस्वीर
- चयन समितियों में अक्सर ऐसे लोग शामिल कर दिए जाते हैं जिन पर राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव का प्रभाव साफ दिखाई देता है।
- वास्तविक योग्यता और शैक्षणिक उपलब्धियों की जगह जातीय समीकरण, सिफारिश और राजनीतिक निष्ठा का पलड़ा भारी हो जाता है।
- पारदर्शिता के अभाव में कई योग्य और काबिल उम्मीदवार दरकिनार कर दिए जाते हैं।
🧭 आदर्श प्रक्रिया कैसी होनी चाहिए?
- स्वतंत्र समिति का गठन – कुलपति चयन के लिए ऐसी समिति बने, जिसमें शिक्षाविद, पूर्व कुलपति और न्यायिक जगत के निष्पक्ष विशेषज्ञ शामिल हों।
- सार्वजनिक प्रक्रिया – आवेदन से लेकर इंटरव्यू और अंतिम चयन तक की पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
- योग्यता पर जोर – उम्मीदवार का शैक्षणिक योगदान, शोध कार्य, नेतृत्व क्षमता और संस्थान को आगे ले जाने का दृष्टिकोण मुख्य कसौटी बने।
- नियमित समीक्षा – चयन के बाद कुलपति के कार्यकाल की समय-समय पर स्वतंत्र समीक्षा हो ताकि जवाबदेही तय हो सके।
📚 शिक्षा व्यवस्था पर असर
यदि कुलपति चयन राजनीतिक या जातीय समीकरणों की भेंट चढ़ता रहेगा, तो विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता प्रभावित होगी। शोध कार्य अविश्वसनीय बनेंगे और छात्रों का भविष्य अंधेरे में धकेल दिया जाएगा। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अकादमिक स्वतंत्रता पर खतरा मंडराने लगेगा और विश्वविद्यालय राजनीति के अखाड़े में बदल जाएंगे।
✅ निष्कर्ष
कुलपति चयन प्रक्रिया को पारदर्शी और योग्यता आधारित बनाना केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था के पुनर्निर्माण की दिशा में अहम कदम है। जब तक योग्यता को प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र चिंतन, नवाचार और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा की क्षमता विकसित नहीं हो पाएगी।