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युद्ध की पीड़ा और बंधकों की प्रतीक्षा


यरूशलेम की हालिया यात्रा के दौरान अमेरिकी सीनेटर मार्क रूबीओ ने उन परिवारों से मुलाकात की जिनके प्रियजन अब भी हमास की कैद में हैं। इन मुलाकातों ने उन्हें गहराई से झकझोर दिया। अपने संदेश में उन्होंने कहा कि जिन परिवारों से वे मिले, उनकी कहानियाँ न केवल हृदय को विचलित करती हैं बल्कि शब्दों से परे दर्द को उजागर करती हैं।

लगातार जारी इस संघर्ष ने असंख्य जिंदगियों को प्रभावित किया है। जिन परिवारों के सदस्य बंदी बनाए गए हैं, उनके लिए हर बीतता दिन असहनीय प्रतीक्षा और असुरक्षा से भरा होता है। उनकी आँखों में एक ही सवाल है—क्या उनका अपना लौटकर आएगा? रूबीओ का आग्रह साफ था: हमास को तुरंत सभी बंधकों को मुक्त करना चाहिए, चाहे वे जीवित हों या मृत।

यह संकट केवल राजनीतिक या सैन्य रणनीति का विषय नहीं है, बल्कि सबसे पहले और सबसे अधिक मानवीय मुद्दा है। इन परिवारों की पीड़ा में केवल खोने का दुःख नहीं है, बल्कि उम्मीद और अदम्य साहस की झलक भी है। वे अपने प्रियजनों की वापसी की आस को थामे हुए हैं।

रूबीओ का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि युद्ध की सबसे भारी कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है। जब तक हर बंधक अपने घर सुरक्षित नहीं लौटता, तब तक यह संघर्ष अधूरा रहेगा और उसका घाव कभी नहीं भर पाएगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ज़िम्मेदारी है कि इस मानवीय संकट पर ध्यान दे और सभी बंधकों को छुड़ाने के प्रयासों को मजबूती से समर्थन दे।


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