
उत्तर प्रदेश की राजनीति में तकरार और आरोप-प्रत्यारोप की परंपरा पुरानी है, लेकिन हाल के दिनों में न्याय व्यवस्था और राजनीतिक ताक़तों के बीच के संबंधों ने गहरी बहस को जन्म दिया है। एक ओर सरकार यह दावा करती है कि उसकी नीतियाँ आम जनता के कल्याण के लिए हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष न्यायपालिका पर प्रभाव डालकर अपने हित साधने की कोशिश करता है। यह परिस्थिति लोकतंत्र और क़ानून की निष्पक्षता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
सत्तारूढ़ दल पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वह अपने फ़ैसलों को मान्य कराने के लिए राजनीतिक दबाव का सहारा लेता है। नतीजा यह होता है कि आम नागरिक और प्रभावशाली वर्ग के लिए न्याय के मानदंड अलग-अलग प्रतीत होते हैं। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कभी न्याय को समझौते की वस्तु की तरह देखा जाता है? इस पर विमर्श इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि इससे क़ानून के शासन की नींव प्रभावित होती है।
इतिहास गवाह है कि वंचित, गरीब और हाशिए पर खड़े समुदायों के लिए न्याय की लड़ाई हमेशा कठिन रही है। जब सत्ता और प्रभावशाली लोग एकजुट होकर अपने हित साधते हैं, तब समाज के कमजोर वर्ग की आवाज़ अक्सर दब जाती है। यही परिस्थिति असंतोष को जन्म देती है, जो सामाजिक संतुलन को कमज़ोर करती है।
इस पूरे परिदृश्य में मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका भी निर्णायक है। सवाल यह है कि क्या मीडिया सच को निष्पक्षता से जनता के सामने ला रहा है, या फिर सत्ता की भाषा बोलने लगा है? जब झूठ को सच का जामा पहनाकर प्रस्तुत किया जाता है, तो आमजन भ्रमित हो जाते हैं और सही-गलत की रेखा धुंधली पड़ जाती है। ऐसे में समाज की ज़िम्मेदारी है कि वह सच को पहचानकर न्याय की आवाज़ को और बुलंद करे।
न्याय कोई सौदेबाज़ी की वस्तु नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। यदि किसी के जीवन या अधिकारों पर आघात होता है, तो यह सरकार और न्यायपालिका का कर्तव्य है कि वह उस व्यक्ति को सुरक्षा और निष्पक्ष न्याय दिलाए। किसी भी स्तर पर दबाव या समझौता लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है।
यह भी विचारणीय है कि सत्ता परिवर्तन के साथ न्याय का स्वरूप क्यों और कैसे बदल जाता है। लोकतंत्र की सच्ची मज़बूती तभी संभव है, जब हर नागरिक को बराबरी का न्याय मिले और न्याय व्यवस्था पूरी तरह स्वतंत्र रहकर काम करे। यही स्थिति भविष्य में एक सशक्त और विश्वासपूर्ण लोकतंत्र की नींव बनेगी।