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लैंगिक समानता: न्यायपूर्ण समाज की नींव, उपकार नहीं


अक्सर समाज में यह भ्रम देखा जाता है कि महिलाओं और लड़कियों को अधिकार देना या उन्हें पुरुषों के समान अवसर प्रदान करना किसी तरह का ‘उपकार’ है। लेकिन सच्चाई यह है कि लैंगिक समानता किसी पर एहसान नहीं, बल्कि यह सभी मनुष्यों के लिए न्याय और गरिमा का मूलभूत सिद्धांत है। जैसा कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा है—समानता केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरी मानवता के संतुलित और न्यायपूर्ण विकास का आधार है।

आज भी दुनिया के कई हिस्सों में गरीबी, संघर्ष, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक अवरोध महिलाओं की प्रगति में रोड़ा बने हुए हैं। इन चुनौतियों की वजह से लड़कियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उचित स्वास्थ्य सेवाएँ, आर्थिक अवसर और राजनीतिक भागीदारी से वंचित रहना पड़ता है। नतीजतन, न केवल उनके सपने अधूरे रह जाते हैं बल्कि समाज की प्रगति भी आधी रह जाती है। कोई भी राष्ट्र तब तक पूरी तरह विकसित नहीं हो सकता जब तक उसकी आधी आबादी पीछे छूट जाए।

यह समझना बेहद ज़रूरी है कि लैंगिक समानता महज़ कानूनों या घोषणाओं का विषय नहीं, बल्कि यह इंसान होने का सबसे बुनियादी अधिकार है। एक ऐसा समाज जहाँ सभी को सम्मान और न्याय मिले, वहाँ शांति, समृद्धि और स्थिरता अपने आप पनपती है। जब महिलाओं को समान अवसर दिए जाते हैं तो अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर बढ़ता है और सामाजिक एकजुटता भी गहरी होती है।

अब समय आ गया है कि हम सब #ActNow की भावना के साथ आगे बढ़ें। महिलाओं और लड़कियों की राह में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करना हमारी साझा जिम्मेदारी है। चाहे शिक्षा का विस्तार हो, जागरूकता का प्रसार या अवसरों की समानता—हर स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे। यह कार्य केवल सरकारों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि समाज के हर व्यक्ति को इसमें योगदान देना होगा।

लैंगिक समानता को हमें एक मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार करना चाहिए, न कि किसी उपकार के रूप में। तभी हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक न्यायपूर्ण, संतुलित और उज्जवल भविष्य की नींव रख पाएंगे।


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