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भारत का सौर ऊर्जा क्षेत्र: अवसर और चुनौतियों के बीच निर्णायक मोड़

नई दिल्ली, 18 सितंबर (एएनआई): भारत का सौर ऊर्जा क्षेत्र इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। हाल के वर्षों में जिस तेजी से देश की मॉड्यूल और सेल उत्पादन क्षमता बढ़ी है, उसने वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति को मजबूत किया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन, वैश्विक व्यापार में उतार-चढ़ाव और तकनीकी बदलाव इस उद्योग के लिए गंभीर चुनौतियाँ पेश कर सकते हैं।

तेजी से बढ़ती उत्पादन क्षमता
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की मॉड्यूल उत्पादन क्षमता लगभग 100 गीगावाट तक पहुँच गई है, जबकि सेल निर्माण क्षमता भी 25 गीगावाट से अधिक हो चुकी है। यह वृद्धि उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना, बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) छूट, अनुमोदित मॉडल और निर्माता सूची (ALMM) जैसी नीतियों और बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की वजह से संभव हो पाई है।

मांग और आपूर्ति का असंतुलन
हालांकि, केवल क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि घरेलू निविदाओं में देरी, अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े निर्यात बाजारों में अनिश्चितता या छत पर लगाए जाने वाले सौर पैनलों (रूफटॉप सोलर) की धीमी गति से मांग कम हो सकती है। इससे उत्पादन इकाइयों की उपयोगिता दर गिर सकती है और कंपनियों को भारी मार्जिन दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

अधिशेष आपूर्ति का खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि अधिशेष आपूर्ति (ओवरसप्लाई) अब केवल एक सैद्धांतिक जोखिम नहीं रह गया है। चीन और अन्य वैश्विक बाजारों में पहले से ही इन्वेंट्री और कीमतों पर दबाव दिखाई देने लगा है। इससे भारतीय उद्योग को भी सीधे प्रभावित होने की आशंका है।

चीन पर निर्भरता बनी चुनौती
भारत के सौर निर्माण क्षेत्र की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह अब भी चीन पर अत्यधिक निर्भर है। पॉलिसिलिकॉन, वेफर्स और सेल जैसे अहम कच्चे माल का 80% से अधिक हिस्सा चीन से आता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, यह निर्भरता भारतीय निर्माताओं को कच्चे माल की कमी, मूल्य उतार-चढ़ाव और कूटनीतिक या व्यापारिक तनाव के जोखिम में डालती है।

भविष्य की राह
उद्योग के रोडमैप के अनुसार, भारत की नाममात्र मॉड्यूल क्षमता 2028 तक 160-170 गीगावाट तक पहुँच सकती है। लेकिन यह तभी फायदेमंद होगा जब घरेलू और वैश्विक बाजारों में मांग स्थिर बनी रहे और चीन पर निर्भरता घटाने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियाँ अपनाई जाएं।

निष्कर्ष
भारत का सौर ऊर्जा क्षेत्र फिलहाल “अवसर और संकट” दोनों से घिरा है। एक ओर यह देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता और हरित भविष्य की ओर ले जा सकता है, तो दूसरी ओर अधिशेष आपूर्ति, वैश्विक व्यापारिक झटके और कच्चे माल की निर्भरता इसकी प्रगति को धीमा कर सकते हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और सौर ऊर्जा क्रांति को स्थायी दिशा देता है।


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