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🇺🇸🌈 “डोंट आस्क, डोंट टेल” का अंत: सैन्य समानता का नया अध्याय


अमेरिकी सेना के इतिहास में “Don’t Ask, Don’t Tell” (DADT) नीति एक ऐसा अध्याय रही, जिसने लंबे समय तक LGBTQ+ सैनिकों को अपनी असली पहचान छिपाने के लिए मजबूर किया। 1993 में लागू की गई इस नीति ने उन्हें सेवा करने का अधिकार तो दिया, लेकिन शर्त यह थी कि वे सार्वजनिक रूप से अपनी यौन पहचान प्रकट नहीं करेंगे। यह स्थिति लगभग दो दशकों तक जारी रही, लेकिन 2010 में इसे समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। यह केवल एक कानून का संशोधन नहीं था, बल्कि न्याय, सम्मान और समानता की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था।


📜 नीति का जन्म और प्रभाव


🔓 परिवर्तन की राह


🗣️ नैन्सी पेलोसी का दृष्टिकोण

अमेरिका की पूर्व स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने इस घटना को याद करते हुए कहा:

“हमें कहा गया था कि ‘Don’t Ask, Don’t Tell’ हमारी सुरक्षा के लिए आवश्यक है। लेकिन हमने साबित किया कि यह भेदभावपूर्ण नीति न केवल गलत थी, बल्कि सेना की गरिमा के विपरीत भी थी। आज जब समानता फिर से खतरे में है, हमें वही साहस दिखाना होगा।”

उनका यह संदेश अतीत की जीत को याद करने के साथ-साथ वर्तमान चुनौतियों से निपटने का आह्वान भी है।


🌍 वर्तमान चुनौतियाँ


🏳️‍🌈 निष्कर्ष

“Don’t Ask, Don’t Tell” का अंत सिर्फ एक सैन्य नीति में बदलाव नहीं था, बल्कि यह मानव गरिमा और समानता की जीत थी। यह घटना इस बात की गवाही देती है कि जब समाज एकजुट होकर भेदभाव के खिलाफ खड़ा होता है, तो बदलाव संभव है। आज जब दुनिया भर में समानता पर नए खतरे मंडरा रहे हैं, हमें फिर से वही साहस और एकजुटता दिखानी होगी — ताकि हर व्यक्ति अपनी पहचान के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जी सके और सेवा कर सके।


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