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जीएसटी वसूली और जनता के सवाल: बीजेपी सरकार के सामने जवाबदेही का प्रश्न


भारत में वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू हुए आठ वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस दौरान केंद्र सरकार ने इसे “एक राष्ट्र, एक कर” की ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन आज जब आम जनता रोज़मर्रा की ज़िंदगी की चुनौतियों—महँगाई, बेरोज़गारी और सामाजिक सुरक्षा—से जूझ रही है, तो स्वाभाविक है कि यह सवाल उठता है: आखिर जीएसटी से वसूला गया अरबों-खरबों रुपया गया कहाँ?

जनता के सवाल

हाल ही में विपक्षी नेताओं और नागरिकों ने कई कटाक्षपूर्ण सवाल उठाए हैं, जिनका सार यही है कि क्या जीएसटी की कमाई का सीधा लाभ जनता तक पहुँचा?

सरकार की नीतियाँ और हकीकत

सच यह है कि जीएसटी से प्राप्त राशि राज्यों और केंद्र सरकार की आय का अहम हिस्सा है। इसी से इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, शिक्षा और सब्सिडी पर खर्च किया जाता है। लेकिन जमीनी स्तर पर लोगों की अपेक्षा है कि इन पैसों का असर उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में साफ दिखना चाहिए। अगर सड़कें अब भी टूटी हुई हैं, अस्पतालों में दवाइयाँ नहीं हैं, स्कूलों में संसाधन कम हैं, तो जनता को यह महसूस होना लाज़मी है कि उनके कर का उपयोग सही दिशा में नहीं हो रहा।

राजनीति और जवाबदेही

भारत की राजनीति में कर वसूली और उसके उपयोग का सवाल नया नहीं है। लेकिन जीएसटी एक ऐसा कर है, जो प्रत्यक्ष रूप से हर नागरिक पर असर डालता है—चाहे वह गरीब हो या मध्यम वर्ग। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा और भी बढ़ जाती है।
यदि जनता यह मानने लगे कि यह पैसा केवल चुनावी राजनीति या “खाली वादों की तिजोरी” में जमा हो रहा है, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

आगे का रास्ता


निष्कर्ष

आठ वर्षों के जीएसटी अनुभव ने यह साफ कर दिया है कि कर वसूली जितनी अहम है, उतनी ही अहम पारदर्शिता भी। जनता के सवाल केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना की आवाज़ हैं। बीजेपी सरकार ही नहीं, बल्कि हर सत्तारूढ़ दल को यह याद रखना होगा कि टैक्स जनता का है, और उसका अंतिम उद्देश्य भी जनता का ही कल्याण होना चाहिए।


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