
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर सुर्ख़ियों में है। लंबे समय तक जेल में रहने के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान को राहत मिली है। उनकी रिहाई के तुरंत बाद पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि आज़म ख़ान पर लगाए गए सभी “झूठे मुक़दमे” सपा की सरकार बनने पर खत्म कर दिए जाएंगे। अखिलेश का यह बयान राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है—क्या यह वास्तविक न्याय का प्रयास है या फिर आगामी चुनावों की तैयारी?
🔹 आज़म ख़ान और विवादों का सिलसिला
आज़म ख़ान दशकों से यूपी की राजनीति के बड़े खिलाड़ी रहे हैं। उनके खिलाफ दर्ज मामलों की लंबी सूची को लेकर सपा लगातार भाजपा सरकार पर बदले की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। सपा नेताओं का कहना है कि आज़म ख़ान को राजनीतिक रूप से कमजोर करने के लिए झूठे केस थोपे गए, जबकि भाजपा इसे कानून की सामान्य प्रक्रिया बताती है।
🔹 अखिलेश यादव का आश्वासन
अखिलेश यादव ने ऐलान किया कि सपा सरकार बनने पर आज़म ख़ान से जुड़े सभी “राजनीतिक मुकदमे” वापस लिए जाएंगे। साथ ही उन्होंने भाजपा सरकार पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि विपक्षी नेताओं को डराने के लिए सत्ता ने कानून का हथियार बना लिया है। इस बीच सपा ने विशेष समिति गठित की है, जो सभी मामलों की समीक्षा करेगी।
🔹 शिवपाल यादव और नेताओं का समर्थन
सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव ने भी आज़म ख़ान के समर्थन में मोर्चा संभाला है। उन्होंने कहा कि पार्टी और कार्यकर्ता पूरी मजबूती से उनके साथ खड़े हैं। यह एकजुटता न सिर्फ़ पार्टी की आंतरिक शक्ति को दिखाती है, बल्कि मुस्लिम मतदाताओं तक एक स्पष्ट संदेश भी भेजती है कि सपा अपने नेताओं के पक्ष में खड़ी है।
🔹 चुनावी समीकरण और राजनीतिक संदेश
विश्लेषकों का मानना है कि आज़म ख़ान की रिहाई को सपा चुनावी रणनीति के हिस्से के रूप में पेश कर रही है। पार्टी इस कदम से मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करना चाहती है। दूसरी ओर भाजपा इसे “क़ानून की जीत” बताकर सपा पर “गुंडाराज की राजनीति” का आरोप लगा रही है। नतीजतन यह मुद्दा दोनों पार्टियों के लिए चुनावी अखाड़े में बड़ा हथियार बन गया है।
🧭 निष्कर्ष
आज़म ख़ान की रिहाई और अखिलेश यादव का बयान केवल एक कानूनी या मानवीय पहलू नहीं है, बल्कि आने वाले चुनावों की दिशा तय करने वाला राजनीतिक मुद्दा भी है। जनता इस कदम को न्याय की बहाली मानती है या महज़ चुनावी स्टंट—यह आने वाले महीनों में साफ़ होगा। इतना तय है कि यह मामला उत्तर प्रदेश की सियासत में केंद्र बिंदु बना रहेगा।