
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध केवल राजनीतिक या सैन्य संघर्ष नहीं है, बल्कि यह मानवता के लिए गहरी पीड़ा का कारण बन चुका है। इस युद्ध की सबसे संवेदनशील और दर्दनाक तस्वीर उन मासूम बच्चों की है जिन्हें जबरन उनके घरों और परिवारों से दूर ले जाया गया। हाल ही में यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि “इस युद्ध की सबसे गहरी चोट बच्चों का अपहरण है। जब तक ये बच्चे अपने घर वापस नहीं लौटते, हम चैन से नहीं बैठेंगे।” इसी भावना के साथ यूरोपीय संघ एक उच्च-स्तरीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है ताकि इस अमानवीय संकट को वैश्विक मंच पर उठाया जा सके।
🧒 बच्चों का अपहरण: युद्ध का सबसे काला अध्याय
- यूक्रेनी सरकार का दावा है कि अब तक हजारों बच्चों को रूस नियंत्रित क्षेत्रों से जबरन ले जाया गया है।
- कई बच्चों को रूसी नागरिकता प्रदान की गई और गोद लेने की प्रक्रिया में शामिल किया गया, जिससे उनकी पहचान, भाषा और संस्कृति पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है।
- अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं ने इन घटनाओं को “मानवाधिकारों का बड़ा उल्लंघन” और “संभावित युद्ध अपराध” करार दिया है।
🌍 यूरोपीय संघ की पहल: एकजुट प्रयास
- यूरोपीय संघ द्वारा प्रस्तावित यह सम्मेलन वैश्विक स्तर पर इस मुद्दे को उजागर करने का प्रयास है।
- इसमें संयुक्त राष्ट्र, यूनिसेफ, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और कई देशों के शीर्ष प्रतिनिधि भाग लेंगे।
- मुख्य उद्देश्य है—बच्चों को सुरक्षित रूप से वापस लाना, अपहरण से जुड़े तथ्यों की जांच करना और भविष्य में ऐसे अपराधों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस नीतियां बनाना।
⚖️ अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिक जिम्मेदारी
- जिनेवा संधि (Geneva Convention) के अनुसार, युद्धकाल में बच्चों का जबरन विस्थापन अंतरराष्ट्रीय कानून का स्पष्ट उल्लंघन है।
- बच्चों को उनकी मातृभूमि और परिवार से अलग करना केवल कानूनी अपराध ही नहीं, बल्कि यह नैतिक दृष्टि से भी गंभीर पाप है।
- यह कृत्य आने वाली पीढ़ियों की पहचान, शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर स्थायी प्रभाव डाल सकता है।
📢 निष्कर्ष: मानवता की साझा जिम्मेदारी
रूस-यूक्रेन युद्ध केवल सीमाओं और राजनीतिक हितों का टकराव नहीं है, बल्कि यह मानवता की असली परीक्षा भी है। मासूम बच्चों का अपहरण इस युद्ध की सबसे क्रूर परछाई है। ऐसे में यूरोपीय संघ की पहल एक महत्वपूर्ण कदम है, जो यह संदेश देती है कि अब दुनिया चुप नहीं रहेगी। यह सम्मेलन उन मासूम आवाज़ों को न्याय दिलाने की दिशा में एक उम्मीद की किरण है।