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📚 ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था का संकट: राजनीति की जकड़ में खोती गुणवत्ता


भारत की शिक्षा प्रणाली, विशेषकर गांवों और छोटे कस्बों की, आज गहरी चुनौतियों से गुजर रही है। हाल ही में सामने आए एक वीडियो ने इसे और उजागर कर दिया—जहां एक शिक्षक ने छात्र के साथ हिंसक व्यवहार किया। यह कोई एक-दो घटनाओं तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि उस व्यापक संकट का हिस्सा है जिसमें शिक्षा पर राजनीति का दबदबा और अयोग्य लोगों की नियुक्ति शामिल है।


⚠️ राजनीतिक दबाव और योग्यता का ह्रास

गांवों के स्कूलों में अध्यापकों की भर्ती में अक्सर शैक्षणिक योग्यता से ज्यादा राजनीतिक संपर्क का महत्व दिया जाने लगा है। ऐसे लोग, जिन्हें शिक्षा की गहराई या बच्चों की जरूरतों की समझ नहीं होती, सिर्फ सिफारिश और सत्ता से निकटता के कारण शिक्षक बन जाते हैं। नतीजतन, न तो वे बच्चों को सही दिशा दे पाते हैं और न ही उनमें संवेदनशीलता दिखा पाते हैं।


👨‍🏫 शिक्षक—मार्गदर्शक या दलगत चेहरा?

शिक्षक समाज का मार्गदर्शक होता है। वह केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि बच्चों के चरित्र निर्माण का प्रमुख स्तंभ है। लेकिन जब वही शिक्षक अनुशासनहीनता, हिंसा और पक्षपात दिखाता है, तो बच्चों के मन में शिक्षा का भय पैदा होता है। इससे वे पढ़ाई से दूर होते हैं और धीरे-धीरे शिक्षा के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण विकसित कर लेते हैं।


📉 गिरती गुणवत्ता और समाज पर असर

ग्रामीण स्कूलों में पहले से ही कई संसाधनों की कमी है—न पुस्तकालय, न विज्ञान प्रयोगशालाएं, न डिजिटल सुविधाएं। योग्य शिक्षक की अनुपस्थिति इस स्थिति को और बदतर बना देती है। शिक्षा की यही कमजोरी आगे चलकर युवाओं को उच्च शिक्षा और रोजगार की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ा देती है। लंबे समय में इसका असर पूरे समाज और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।


🛑 समाधान की राह

केवल आलोचना से स्थिति नहीं सुधरेगी। इसके लिए ठोस पहल की जरूरत है:


✍️ निष्कर्ष

शिक्षा सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा करने का साधन नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को गढ़ने वाली प्रक्रिया है। यदि इस प्रक्रिया को राजनीति और भ्रष्टाचार के हवाले कर दिया जाए, तो भविष्य की पीढ़ी अधूरी और असंवेदनशील रह जाएगी। समय आ गया है कि ग्रामीण शिक्षा को पुनः जीवंत किया जाए—जहां योग्यता को प्राथमिकता मिले और राजनीति की दखलंदाजी पूरी तरह खत्म हो।


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