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🚜 किसानों को खाद की किल्लत: प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल


🌱 प्रस्तावना

उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इन दिनों किसान खाद के संकट से जूझ रहे हैं। बुवाई का समय शुरू हो चुका है, लेकिन आवश्यक उर्वरक न मिलने से किसान असमंजस में हैं। जगह-जगह से ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं, जिनमें किसान घंटों लंबी कतारों में खड़े दिखाई देते हैं, फिर भी उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। यह स्थिति प्रशासन की सुस्त कार्यशैली और सरकार की किसान-हितैषी नीतियों पर सवाल खड़े करती है।

🧪 खाद संकट की असली तस्वीर

📉 प्रशासन की निष्क्रियता

🗣️ राजनीति की गूंज

पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा कि “यह किसान विरोधी रवैया है, जहां शिकायत के बिना सरकार काम ही नहीं करती।” उनका कहना है कि सरकार की चुप्पी प्रशासनिक लापरवाही और किसानों के प्रति असंवेदनशील मानसिकता का उदाहरण है।

🌾 किसान की मुश्किलें

📌 रास्ता क्या हो सकता है?

📝 निष्कर्ष

किसानों को खाद की उपलब्धता केवल मौसमी समस्या नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था की रीढ़ से जुड़ा मुद्दा है। जब समय पर खाद नहीं मिलती, तो उसका असर फसल, किसान, बाज़ार और अंततः उपभोक्ता सभी पर पड़ता है। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि किसान-नीति की विफलता भी है। अब ज़रूरत है कि इस संकट को चुनावी बहस से ऊपर उठाकर गंभीरता से लिया जाए, वरना आने वाले दिनों में इसका खामियाज़ा पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा।


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