
हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों से लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं जिनमें तेंदुए, भेड़िये, अजगर और यहां तक कि आवारा सांड भी आम लोगों के लिए खतरा बनते दिखाई दे रहे हैं। गांवों और कस्बों में वन्यजीवों के हमले अब अपवाद नहीं बल्कि एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। यह स्थिति न केवल जनसुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लगाती है बल्कि शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर भी सवाल खड़े करती है।
📹 अखिलेश यादव का वीडियो और कटाक्ष
27 सितंबर को समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया। वीडियो में क्षतिग्रस्त मकान के बीच से गुजरती एक महिला दिखाई देती है, जिस पर 23 सितंबर की तारीख दर्ज है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए लिखा:
“कहीं भेड़िया, कहीं तेंदुआ, कहीं अजगर, कहीं सांड… यूपी में हर ओर आतंक का माहौल है। लेकिन भाजपा सरकार इसे गंभीरता से लेने के बजाय यह कहकर पल्ला झाड़ रही है कि जानवरों के पंजे के निशान नहीं मिले। जिन लोगों के शरीर पर गहरे जख्म हैं, क्या वे प्रमाण नहीं हैं?”
यह बयान सरकार की निष्क्रियता पर सीधा प्रहार करता है और एक व्यंग्यात्मक सवाल भी उठाता है कि क्या अब पीड़ितों की आवाज की जगह केवल CCTV फुटेज को ही सबूत माना जाएगा।
🌱 वन्यजीवों की बढ़ती मौजूदगी: कारणों की पड़ताल
ग्रामीण इलाकों में बढ़ते वन्यजीव-मानव टकराव के पीछे कई वजहें सामने आती हैं:
- वनों का सिकुड़ना: तेजी से हो रही कटाई और अतिक्रमण ने जानवरों के प्राकृतिक घरों को सीमित कर दिया है।
- भोजन की कमी: जंगलों में शिकार और वनस्पति कम होने के कारण जानवर गांवों का रुख कर रहे हैं।
- पर्यावरणीय असंतुलन: जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के असमान वितरण ने संतुलन बिगाड़ दिया है।
- अनियोजित विकास: शहरीकरण की अंधाधुंध रफ्तार ने मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की जमीन तैयार कर दी है।
🛡️ प्रशासनिक रवैया: सक्रियता या उदासीनता?
इन घटनाओं के बाद सरकारी विभागों की प्रतिक्रिया अक्सर धीमी और सीमित दिखाई देती है। पीड़ितों को मुआवजा पाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ता है और वन विभाग की कार्रवाई प्रायः अस्थायी समाधान तक ही सीमित रहती है। वहीं राजनीतिक दल इस मुद्दे को चुनावी बहस का हिस्सा बना देते हैं, लेकिन ठोस और दीर्घकालिक कदम कम ही देखने को मिलते हैं।
🗣️ सामाजिक विमर्श की आवश्यकता
यह प्रश्न सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। अखिलेश यादव का बयान इस गहरी चिंता की ओर संकेत करता है कि क्या सरकार पीड़ितों के दर्द को सुनने के बजाय केवल तकनीकी प्रमाणों पर टिके रहना चाहती है। मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष को समझने के लिए पर्यावरणीय, सामाजिक और राजनीतिक—तीनों पहलुओं पर एक संयुक्त विमर्श अनिवार्य है।
🔍 निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश में वन्यजीवों के हमले अब एक बड़ी चुनौती का रूप ले चुके हैं। यह केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि पर्यावरणीय नीतियों, शासन की प्राथमिकताओं और समाज की संवेदनशीलता की भी कसौटी है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे इसे केवल बयानबाज़ी का विषय न बनाएं, बल्कि ठोस योजनाओं और दीर्घकालिक नीतियों के माध्यम से समस्या का समाधान प्रस्तुत करें।