
अमेरिका इन दिनों एक बार फिर गंभीर राजनीतिक टकराव से जूझ रहा है। डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन के बीच बजट को लेकर खींचतान इतनी बढ़ गई है कि संघीय सरकार के “शटडाउन” यानी आंशिक बंद होने की स्थिति बन सकती है। इस संकट के केंद्र में है—स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च और साधारण अमेरिकी परिवारों की आर्थिक स्थिरता।
🗣️ नैन्सी पेलोसी का तीखा वार
पूर्व स्पीकर और वरिष्ठ डेमोक्रेटिक नेता नैन्सी पेलोसी ने हाल ही में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान रिपब्लिकन पार्टी की आलोचना करते हुए कहा:
“रिपब्लिकन नीतियों से सरकारी कामकाज ठप हो सकता है, और इसका सबसे बड़ा बोझ कामकाजी वर्ग पर पड़ेगा—खासकर स्वास्थ्य बीमा की लागत बढ़ने के रूप में।”
वाशिंगटन में हुई रैली में उन्होंने “HEALTHCARE OVER BILLIONAIRES” लिखा पोस्टर उठाकर यह स्पष्ट किया कि डेमोक्रेट्स की प्राथमिकता जनता की स्वास्थ्य सेवाएं हैं, न कि अमीर वर्ग को अतिरिक्त कर रियायतें देना।
💰 विवाद की जड़
सरकारी बजट की समयसीमा नजदीक है और रिपब्लिकन सांसद सामाजिक कल्याण योजनाओं—खासतौर पर मेडिकेड और ओबामाकेयर—में कटौती की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, डेमोक्रेट्स का कहना है कि ऐसा करने से करोड़ों अमेरिकियों की स्वास्थ्य सुविधा प्रभावित होगी।
अगर तय समय तक सहमति नहीं बनी तो लाखों सरकारी कर्मचारियों का वेतन रुक सकता है और कई जरूरी सेवाएं अस्थायी रूप से बंद करनी पड़ सकती हैं।
🏛️ दो दृष्टिकोण: “बिल्ड बैक बेटर” बनाम “खर्च में कटौती”
डेमोक्रेट्स का “Build Back Better” एजेंडा शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर निवेश को प्राथमिकता देता है। इसके विपरीत, रिपब्लिकन पार्टी वित्तीय अनुशासन और बजट घाटा घटाने के लिए सार्वजनिक खर्चों में कमी चाहती है—even if it means कमज़ोर वर्गों की बुनियादी सुविधाओं पर असर पड़े।
यह विवाद सिर्फ़ आर्थिक नीतियों का नहीं, बल्कि वैचारिक टकराव का भी प्रतीक है—क्या सरकार का काम जनता की भलाई सुनिश्चित करना है या फिर केवल वित्तीय सख्ती बनाए रखना?
🔍 निष्कर्ष
अमेरिका की यह बहस वैश्विक लोकतंत्रों के लिए भी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—क्या अरबपतियों को कर लाभ देने के लिए आम नागरिकों की स्वास्थ्य सुरक्षा से समझौता किया जाना चाहिए? या फिर सरकारी नीतियों का केंद्र जनता की ज़रूरतें होनी चाहिए?
नैन्सी पेलोसी का हालिया बयान और उनका सड़क पर उतरकर विरोध करना इस बात का संकेत है कि डेमोक्रेट्स इस संघर्ष को केवल संसद के गलियारों में ही नहीं, बल्कि जनता के बीच भी जारी रखेंगे।