
म्यांमार लंबे समय से ऐसे मानवीय संकट से जूझ रहा है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। खासकर रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय और अन्य अल्पसंख्यक समूह लगातार भेदभाव, हिंसा और बहिष्कार का शिकार बने हुए हैं। यह मामला केवल म्यांमार की आंतरिक समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक मानवाधिकारों और नैतिक जिम्मेदारी से जुड़ा मुद्दा है।
🚨 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
रोहिंग्या समुदाय को दशकों से म्यांमार की नागरिकता से वंचित रखा गया है। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर रखा गया और सैन्य कार्रवाइयों ने उनकी स्थिति और भी भयावह बना दी। 2017 में हुए बड़े पैमाने पर दमन और हिंसा के बाद लाखों रोहिंग्या अपनी जान बचाने के लिए म्यांमार से पलायन कर बांग्लादेश जा पहुँचे। आज भी लगभग 10 लाख शरणार्थी पड़ोसी देशों के शिविरों में रह रहे हैं।
🇧🇩 बांग्लादेश की भूमिका
बांग्लादेश ने इन विस्थापित परिवारों को अस्थायी आश्रय देकर बड़ी मानवीय पहल की है। कॉक्स बाज़ार के शरणार्थी शिविर दुनिया के सबसे बड़े शरणार्थी स्थलों में गिने जाते हैं। लेकिन यह व्यवस्था दीर्घकालिक समाधान नहीं है। रोहिंग्या समुदाय का स्थायी अधिकार तभी सुरक्षित होगा, जब वे सम्मानजनक और सुरक्षित परिस्थितियों में अपने घर लौट पाएँगे।
🗣️ संयुक्त राष्ट्र की अपील
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने हाल ही में महासभा (#UNGA) को संबोधित करते हुए कहा कि रोहिंग्या और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और अधिकार सुनिश्चित करना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्याय, सम्मान और स्वैच्छिक वापसी इनके मौलिक अधिकार हैं और इन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
🔍 समाधान की दिशा
इस लंबे संकट का हल सिर्फ राहत सामग्री से नहीं निकलेगा। इसके लिए ठोस राजनीतिक और कूटनीतिक प्रयास आवश्यक हैं:
- म्यांमार की सरकार को अंतरराष्ट्रीय दबाव में अपने रवैये में बदलाव लाना होगा।
- रोहिंग्या को नागरिकता और समान अधिकार दिए बिना स्थायी समाधान संभव नहीं है।
- वापसी के बाद उनके लिए सुरक्षा, आवास और पुनर्वास की गारंटी होनी चाहिए।
- क्षेत्रीय और वैश्विक संस्थानों जैसे ASEAN, SAARC और संयुक्त राष्ट्र को मिलकर कार्य करना होगा।
🙏 निष्कर्ष
रोहिंग्या संकट केवल मानवाधिकारों का नहीं, बल्कि पूरी मानवता की परीक्षा है। सहानुभूति दिखाना पर्याप्त नहीं है—अब वैश्विक नेतृत्व को न्याय और कार्रवाई के ठोस कदम उठाने होंगे। जब तक रोहिंग्या और अन्य पीड़ित समुदाय सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन नहीं जी पाते, तब तक यह संकट अधूरा ही रहेगा।