
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 25 अक्टूबर 2025 को अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद रेपो रेट को 5.5% पर स्थिर रखने का फैसला किया। यह लगातार दूसरी बार है जब केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कोई परिवर्तन नहीं किया। इस कदम को अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनाए रखने और विकास व मुद्रास्फीति के बीच संतुलन कायम करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
📌 रेपो रेट क्या है?
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है। जब यह दर कम होती है, तो बैंक सस्ते ऋण लेते हैं और आम जनता को भी कम ब्याज पर कर्ज़ मिल सकता है। वहीं, जब रेपो रेट बढ़ती है, तो ऋण महंगे हो जाते हैं, जिससे खर्च और निवेश में कमी आती है और मुद्रास्फीति पर नियंत्रण मिलता है।
📊 रेपो रेट को स्थिर रखने के कारण
- मुद्रास्फीति पर नियंत्रण: हाल के महीनों में खुदरा मुद्रास्फीति में हल्की कमी आई है, लेकिन यह RBI के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। ब्याज दरों को स्थिर रखकर केंद्रीय बैंक यह संकेत देना चाहता है कि वह मुद्रास्फीति पर सतर्क नजर रखे हुए है।
- विकास दर को बनाए रखना: यदि ब्याज दरें बढ़ेंगी, तो निवेश और खपत प्रभावित हो सकते हैं। भारत की आर्थिक वृद्धि वर्तमान में सकारात्मक है, और RBI चाहता है कि यह गति बनी रहे।
- वैश्विक अस्थिरता: अमेरिका और यूरोप में ब्याज दरों की उतार-चढ़ाव, ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारक भी RBI के निर्णय में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
🗣️ आरबीआई गवर्नर का दृष्टिकोण
आरबीआई के गवर्नर ने कहा,
“हमारी प्राथमिकता आर्थिक स्थिरता है। रेपो रेट को यथावत रखने का निर्णय गहन विश्लेषण के बाद लिया गया है। हमारा लक्ष्य मुद्रास्फीति और विकास के बीच संतुलन बनाए रखना है।”
🔮 आगे की संभावनाएँ
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में मुद्रास्फीति और घटती है, तो RBI ब्याज दर में कटौती पर विचार कर सकता है। वहीं, वैश्विक परिस्थितियों में उथल-पुथल या घरेलू मांग में तेज़ी आने पर रेपो रेट बढ़ सकती है।