
दिनांक: 1 अक्टूबर 2025
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया है, जिसमें विवाह का प्रलोभन देकर दुष्कर्म के आरोप में दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को खारिज कर दिया गया। अदालत ने साफ कहा कि यह मामला “बाद में सोचा गया कदम” (afterthought) था और इसे प्रतिशोध की नीयत से दर्ज कराया गया था।
🔹 मामला क्या था?
मध्य प्रदेश की एक नगर निगम कर्मचारी, जो कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर कार्यरत थी, ने अपने सहकर्मी—असिस्टेंट रेवेन्यू इंस्पेक्टर—पर विवाह का वादा कर शारीरिक संबंध बनाने और बाद में मुकर जाने का आरोप लगाया था।
महिला और आरोपी पिछले पाँच वर्षों से एक-दूसरे को जानते थे और आपस में मित्रवत संबंध भी थे। महिला के विवाहिता होने और एक पुत्र होने के बावजूद, उसने आरोपी के साथ विवाह के आश्वासन पर शारीरिक संबंध बनाए।
उसका आरोप था कि 15 मार्च 2023 को आरोपी ने जबरन संबंध बनाए और यह सिलसिला अप्रैल 2023 तक चलता रहा। लेकिन जब महिला ने विवाह की बात की, तो आरोपी ने इंकार करते हुए उसे किसी और से विवाह करने की सलाह दी। इसके बाद महिला ने दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया।
🔹 पृष्ठभूमि और विवाद
दिलचस्प पहलू यह रहा कि आरोपी ने FIR दर्ज होने से पहले ही महिला के खिलाफ कई शिकायतें दायर की थीं, जिनमें उत्पीड़न, आत्महत्या की धमकी और दुर्व्यवहार जैसी बातें शामिल थीं।
इसके बाद नगर निगम और पुलिस प्रशासन के समक्ष आरोपी ने लिखित प्रतिवेदन दिया। परिणामस्वरूप, 6 जुलाई 2023 को महिला को उसके नियोक्ता द्वारा शो-कॉज नोटिस जारी किया गया, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि यदि उसका व्यवहार नहीं सुधरा तो नौकरी से बर्खास्तगी भी हो सकती है।
महिला ने यह FIR कथित घटना के लगभग चार महीने बाद दर्ज कराई और वह भी तब, जब उसके खिलाफ प्रशासनिक कार्यवाही शुरू हो चुकी थी।
🔹 सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को पलटते हुए कार्यवाही रद्द कर दी, जिसमें FIR खारिज करने से इनकार कर दिया गया था।
अदालत ने कहा कि शिकायत दर्ज कराने का समय और परिस्थितियाँ इस ओर संकेत करती हैं कि यह कार्रवाई प्रतिशोध स्वरूप की गई। FIR का उद्देश्य आरोपी को दंडित करना नहीं, बल्कि व्यक्तिगत बदले की भावना प्रतीत होती है।
🔹 निर्णय का महत्व
यह फैसला न्यायिक दृष्टिकोण से कई मायनों में अहम है:
- यह दर्शाता है कि विवाह के वादे पर दुष्कर्म संबंधी मामलों की सच्चाई को सिर्फ सतही आरोपों के आधार पर नहीं परखा जा सकता।
- FIR दर्ज करने में हुई देरी और पूर्ववर्ती घटनाओं को अदालत ने गंभीरता से लिया।
- यह निर्णय उन मामलों में नजीर बन सकता है, जहाँ शिकायतें व्यक्तिगत विवाद और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित हों।
🔹 निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून का दुरुपयोग रोकना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि पीड़ित को न्याय दिलाना। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल विवाह का वादा और उसके पूरे न होने मात्र से हर मामला दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता।
👉 यह निर्णय न केवल न्यायपालिका की संवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि आरोप और तथ्य के बीच स्पष्ट रेखा खींचना ज़रूरी है, ताकि न्याय की गरिमा बनी रहे।