
2 अक्टूबर 2025 को दुनिया ने एक ऐसी व्यक्तित्वपूर्ण महिला को खो दिया, जिसने हमें यह सिखाया कि जंगल केवल जानवरों का घर नहीं, बल्कि हमारी अपनी जड़ों का प्रतिबिंब हैं। प्रख्यात प्राइमेटोलॉजिस्ट और पर्यावरण योद्धा डॉ. जेन गुडॉल का निधन केवल वैज्ञानिक समुदाय के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए अपूरणीय क्षति है। उनकी यात्रा एक ऐसे युग की गवाही है, जहां शोध प्रयोगशाला से निकलकर आम इंसानों के दिलों तक पहुँचा।
🧠 विज्ञान में नए क्षितिज खोलने वाली अग्रणी
1960 के दशक में जब महिलाएं शोध जगत में अक्सर हाशिए पर रखी जाती थीं, तब युवा जेन गुडॉल ने तंज़ानिया के गोम्बे नेशनल पार्क में चिंपांज़ियों का अध्ययन शुरू किया। उनकी खोज—कि चिंपांज़ी उपकरणों का उपयोग करते हैं, भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं और सामाजिक ढांचे में रहते हैं—ने उस दौर की वैज्ञानिक धारणाओं को पूरी तरह चुनौती दी। उन्होंने जानवरों को ‘विषय’ नहीं, बल्कि जीवित संवेदनशील इकाई के रूप में प्रस्तुत किया।
🌍 धरती की प्रहरी और युवाओं की प्रेरणा
अपने शोध से आगे बढ़कर जेन ने संरक्षण और शिक्षा के क्षेत्र में भी गहरा प्रभाव छोड़ा। Jane Goodall Institute और Roots & Shoots जैसे कार्यक्रमों ने न केवल पर्यावरण जागरूकता फैलाई बल्कि युवाओं को सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया। उनका संदेश स्पष्ट था—प्रकृति की रक्षा सिर्फ वैज्ञानिकों का काम नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
🤝 वैश्विक मान्यता और निजी श्रद्धांजलि
उनकी विदाई पर दुनिया भर से शोक संदेश आए। अमेरिकी नेता नैन्सी पेलोसी ने लिखा कि जेन गुडॉल ने “प्राकृतिक दुनिया की हमारी समझ को नए सिरे से गढ़ा और पीढ़ियों को सशक्त किया।” यह श्रद्धांजलि दर्शाती है कि उनका प्रभाव राजनीति, समाज और शिक्षा तक फैला हुआ था—सिर्फ विज्ञान तक सीमित नहीं।
🔥 विरासत जो अनन्त है
गुडॉल ने यह सिद्ध कर दिया कि अकेला इंसान भी बदलाव की दिशा तय कर सकता है। चाहे वह जलवायु परिवर्तन की लड़ाई हो, पशु अधिकारों का मुद्दा हो या जैव विविधता का संरक्षण—उनका दृष्टिकोण आज भी वैश्विक आंदोलनों की धड़कन है।
उनका जाना निश्चित रूप से एक शून्य छोड़ गया है, लेकिन उनकी शिक्षाएँ, उनकी जिजीविषा और उनका साहस आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बने रहेंगे। जेन गुडॉल भले ही हमारे बीच न हों, पर उनकी प्रकृति की पुकार हमेशा जीवित रहेगी।