
इटली की संसद ने हाल ही में एक ऐसा कानून पारित किया है, जिसे देश के पर्यावरणीय और सामाजिक इतिहास में मील का पत्थर माना जा रहा है। यह कानून “टेरा देई फुओकी” (Terra dei Fuochi) डिक्री-लॉ है, जो दक्षिणी इटली के कैम्पानिया क्षेत्र में फैले अवैध कचरा प्रबंधन और उससे जुड़े अपराध नेटवर्क पर प्रहार करता है।
🌍 ‘टेरा देई फुओकी’ की सच्चाई
“टेरा देई फुओकी” का शाब्दिक अर्थ है “आग की भूमि”। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इस क्षेत्र में दशकों से अवैध रूप से औद्योगिक व रासायनिक कचरे को जलाया जाता रहा है। इस अवैध गतिविधि ने खेतों, जलस्रोतों और हवा को जहरीला बना दिया। नतीजा यह हुआ कि यहाँ के निवासियों को असामान्य रूप से अधिक कैंसर, श्वसन रोग और जन्मजात बीमारियों का सामना करना पड़ा। यह क्षेत्र धीरे-धीरे पर्यावरणीय अपराध का प्रतीक बन गया।
👮♂️ डिक्री-लॉ के प्रावधान
नए कानून के मुख्य बिंदु हैं:
- संगठित माफिया समूहों, विशेषकर कैमोरा, द्वारा कचरे की तस्करी और जलाने पर सख्त कार्रवाई।
- पर्यावरणीय अपराधों को गंभीर अपराधों की श्रेणी में शामिल कर कठोर दंड का प्रावधान।
- स्थानीय प्रशासन और न्यायिक संस्थाओं को अधिक कानूनी शक्तियाँ।
- प्रदूषित इलाकों की सफाई और पुनर्वास की प्रक्रिया को तेज करना।
कानून के लागू होने के शुरुआती महीनों में ही पुलिस और न्यायपालिका ने कई अवैध स्थलों को बंद किया, अपराधियों को गिरफ्तार किया और प्रभावित क्षेत्रों में सुधारात्मक कदम शुरू किए।
🏞️ स्थानीय नागरिकों के लिए उम्मीद की किरण
प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने इस पहल को “नैतिक प्रतिबद्धता” कहा है। उनके अनुसार यह सिर्फ कानूनी सुधार नहीं बल्कि सामाजिक पुनर्निर्माण की दिशा में उठाया गया कदम है। इसका मकसद नेपल्स, कासेर्ता और आसपास के नागरिकों को एक ऐसा भविष्य देना है, जहाँ वे स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल और स्वस्थ जीवन का आनंद ले सकें।
🔍 आगे की चुनौतियाँ
हालांकि इस कानून को लेकर उम्मीदें बड़ी हैं, लेकिन इसकी सफलता इन बातों पर निर्भर करेगी:
- स्थानीय प्रशासन की पारदर्शिता और तत्परता।
- नागरिक समाज और मीडिया द्वारा लगातार निगरानी।
- पुनर्वास योजनाओं, स्वास्थ्य सेवाओं और प्रभावित नागरिकों के हितों को प्राथमिकता देना।
🌐 वैश्विक महत्व
“टेरा देई फुओकी” डिक्री-लॉ केवल इटली का मुद्दा नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए उदाहरण है कि जब अपराध और पर्यावरणीय संकट मिलकर किसी समाज को जकड़ लें, तो सरकार, नागरिक और संस्थाएँ मिलकर निर्णायक लड़ाई लड़ सकते हैं।