
लेखक: अनूप
भारतीय समाज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) एक ऐसा संगठन रहा है जिसने 100 वर्षों में विचार, सेवा और राष्ट्रभक्ति को समेटते हुए समाज के हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी है। 1925 में विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित यह संगठन आज न केवल सांस्कृतिक संगठन के रूप में जाना जाता है, बल्कि यह राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक सक्रिय शक्ति बन चुका है।
🕰️ आरंभ और उद्देश्य
संघ का जन्म उस समय हुआ जब भारत विदेशी शासन की जंजीरों में बंधा था। डॉ. हेडगेवार ने महसूस किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि सामाजिक जागृति और सांस्कृतिक सशक्तिकरण भी उतना ही जरूरी है। संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य था—एक संगठित, जागरूक और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण।
🧭 विचार और कार्यशैली
RSS की मूल कार्यप्रणाली “शाखा” प्रणाली पर आधारित है। यहाँ स्वयंसेवक नियमित रूप से मिलकर शारीरिक अभ्यास, बौद्धिक चर्चाएँ और राष्ट्रभक्ति से जुड़ी गतिविधियाँ करते हैं। संघ की विचारधारा हिंदुत्व पर केंद्रित है, जिसे यह भारतीय सांस्कृतिक पहचान का आधार मानता है। यह विचारधारा किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की प्रेरणा देती है।
🤝 सेवा और आपदा प्रबंधन
संघ ने समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्यों में सक्रिय योगदान दिया है। भूकंप, बाढ़ और महामारी जैसे संकटों के दौरान स्वयंसेवकों ने भोजन वितरण, स्वास्थ्य जागरूकता और आपातकालीन सहायता के माध्यम से सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया। कोविड-19 महामारी में लाखों स्वयंसेवकों ने टीकाकरण जागरूकता, मास्क वितरण और सामाजिक सहायता में भाग लिया।
🏛️ राष्ट्र निर्माण में योगदान
RSS ने शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समरसता के क्षेत्र में विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से योगदान दिया है। विद्या भारती, सेवा भारती, संस्कार भारती और वनवासी कल्याण आश्रम जैसी संस्थाएँ समाज के अलग-अलग हिस्सों तक सेवा पहुँचाने का कार्य कर रही हैं।
📣 विवाद और आलोचना
RSS को लेकर विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं। कुछ इसे राष्ट्रभक्ति और सामाजिक सेवा का प्रेरक मानते हैं, जबकि कुछ इसे संकीर्ण दृष्टिकोण वाला बताते हैं। फिर भी, संघ ने हमेशा लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर रहकर अपने विचारों का प्रसार किया है और हिंसात्मक मार्ग अपनाने से बचा है।
🎯 निष्कर्ष
सौ वर्षों की यात्रा में RSS ने स्वयं को अनुशासित, सेवा-परायण और राष्ट्रनिष्ठ संगठन के रूप में स्थापित किया है। इसकी विचारधारा से सहमत या असहमत होना व्यक्तिगत दृष्टिकोण है, लेकिन यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता कि संघ ने भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।