
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया है कि वह सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा की उत्तर कुंजी तभी जारी करेगा जब संपूर्ण परीक्षा चक्र — जिसमें मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार भी शामिल हैं — पूर्ण हो जाएगा। यह रुख आयोग की उस दीर्घकालिक नीति को दोहराता है, जिसमें परीक्षा की निष्पक्षता और गोपनीयता को सर्वोपरि माना जाता है।
⚖️ न्यायिक हस्तक्षेप और UPSC की आपत्ति
इससे पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) ने UPSC को निर्देश दिया था कि वह प्रारंभिक परीक्षा के तुरंत बाद उत्तर कुंजी सार्वजनिक करे। आयोग ने इस आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी, और अब सर्वोच्च न्यायालय में अपना पक्ष स्पष्ट किया है। UPSC का तर्क है कि समय से पहले उत्तर कुंजी जारी करने से परीक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है, विशेषकर तब जब समान प्रश्नों का उपयोग भविष्य की परीक्षाओं में भी किया जा सकता है।
🔍 पारदर्शिता की मांग और छात्रों की चिंता
परीक्षार्थियों का एक वर्ग यह मांग करता रहा है कि उत्तर कुंजी शीघ्र जारी की जाए ताकि वे अपनी प्रदर्शन का मूल्यांकन कर सकें और यदि आवश्यक हो तो आपत्तियाँ दर्ज कर सकें। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि आयोग की प्रक्रिया में विश्वास भी मजबूत होगा। हालांकि UPSC का मानना है कि ऐसी पारदर्शिता परीक्षा की गोपनीयता से समझौता कर सकती है।
📊 संभावित समाधान: तकनीकी और प्रक्रियात्मक सुधार
विशेषज्ञों का सुझाव है कि UPSC एक मध्य मार्ग अपना सकता है — जैसे कि एक सीमित अवधि के लिए उत्तर कुंजी जारी करना, जिसमें आपत्तियाँ ली जाएँ और फिर उन्हें वापस ले लिया जाए। साथ ही, प्रश्न बैंक को अधिक विविध और अद्यतन बनाकर प्रश्नों की पुनरावृत्ति की संभावना को कम किया जा सकता है।
🧭 निष्कर्ष: संतुलन की आवश्यकता
UPSC की भूमिका केवल परीक्षा आयोजित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की प्रशासनिक गुणवत्ता को सुनिश्चित करने का माध्यम भी है। ऐसे में पारदर्शिता और निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। उत्तर कुंजी की समयबद्ध और विवेकपूर्ण घोषणा इस दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है — बशर्ते आयोग इसके लिए तकनीकी और प्रक्रियात्मक ढांचे को मजबूत करे।