
हर वर्ष अक्टूबर के पहले सोमवार को मनाया जाने वाला विश्व आवास दिवस मानवता के उस साझा वादे की याद दिलाता है, जो “घर” से जुड़ा है—एक सुरक्षित, गरिमापूर्ण और टिकाऊ जीवन का वादा। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा था, “शहर एक वादा हैं—घर का वादा।” यह कथन आज की दुनिया में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि शहर अब केवल इमारतों के समूह नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अस्तित्व के केंद्र बन चुके हैं।
🏙️ शहरीकरण की तेज़ रफ़्तार और बढ़ती चुनौतियाँ
21वीं सदी को “शहरों की सदी” कहा जा सकता है। भारत सहित कई विकासशील देशों में लोग बेहतर अवसरों की तलाश में गाँवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
लेकिन यह बदलाव अनेक जटिल समस्याएँ लेकर आया है —
- जनसंख्या वृद्धि से बुनियादी सुविधाओं पर बढ़ता दबाव
- सस्ते आवास की भारी कमी
- ट्रैफिक, प्रदूषण और जल संकट जैसी गंभीर चुनौतियाँ
- और सबसे अहम, सामाजिक असमानता का बढ़ना
यदि इन चुनौतियों का समाधान समग्र दृष्टिकोण से नहीं किया गया, तो शहर विकास के बजाय असमानता के प्रतीक बन जाएंगे।
🛡️ शहरों को लचीला और संकट-रोधी बनाना
आधुनिक शहर केवल अर्थव्यवस्था के इंजन नहीं हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, महामारी, और प्राकृतिक आपदाओं के प्रमुख केंद्र भी बनते जा रहे हैं।
- कोविड-19 महामारी ने यह उजागर किया कि शहरी स्वास्थ्य ढाँचा कितना असमान है।
- बाढ़, सूखा, और चरम तापमान जैसी घटनाएँ शहरों की तैयारी और टिकाऊ ढाँचे की परीक्षा ले रही हैं।
इसलिए आवश्यक है कि शहरों को इस प्रकार विकसित किया जाए कि वे संकटों का सामना कर सकें और फिर भी अपने नागरिकों को सुरक्षित, स्वस्थ और गरिमापूर्ण जीवन दे सकें।
🏘️ समावेशी और टिकाऊ शहरी विकास का विज़न
विश्व आवास दिवस केवल प्रतीकात्मक दिवस नहीं, बल्कि कार्रवाई का आह्वान है—ऐसे शहर बनाने का जो हर नागरिक के लिए हों।
एक सशक्त शहर वही है:
- जहाँ हर व्यक्ति को किफायती और सुरक्षित आवास मिले
- जहाँ सार्वजनिक स्थान, पार्क, सड़कें और सुविधाएँ सभी के लिए सुलभ हों
- जहाँ जाति, धर्म, लिंग या आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना समान अवसर हों
- और जहाँ तकनीक, नवाचार और हरित ऊर्जा के माध्यम से जीवन अधिक टिकाऊ बने
🌍 भारत के संदर्भ में: स्थानीय दृष्टि से वैश्विक सोच
भारत में प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY), स्मार्ट सिटी मिशन, और AMRUT जैसी योजनाएँ एक बेहतर शहरी भविष्य की दिशा में कदम हैं।
फिर भी, इन योजनाओं की सफलता तभी संभव है जब —
- स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाए,
- शहरी योजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक न्याय को समान प्राथमिकता दी जाए,
- और शहरों को केवल “आर्थिक केंद्र” नहीं, बल्कि “मानवीय केंद्र” के रूप में देखा जाए।
✨ निष्कर्ष: शहर—एक साझा ज़िम्मेदारी
शहरों को विकसित करना केवल ईंट और सीमेंट का काम नहीं है; यह मानवता की एक नैतिक और सामाजिक प्रतिबद्धता है।
विश्व आवास दिवस हमें यह याद दिलाता है कि हर शहर एक जीवित कहानी है — जिसमें आशा, विविधता और भविष्य का सपना बसा है।
आइए, हम ऐसे शहरों का निर्माण करें जो न केवल टिकाऊ हों, बल्कि अपने हर नागरिक को “घर” जैसी अपनापन और सुरक्षा का एहसास दें।