
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में सोशल मीडिया मंच TikTok पर अपना पहला वीडियो साझा कर डिजिटल राजनीति के एक नए दौर की शुरुआत कर दी है। यह कदम सिर्फ एक सामान्य ऑनलाइन गतिविधि नहीं, बल्कि युवा मतदाताओं से जुड़ने की एक सुविचारित रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
📱 TikTok पर ट्रंप की वापसी: संदेश में निहित संकेत
ट्रंप ने अपने आधिकारिक अकाउंट @realdonaldtrump से जो पहला वीडियो जारी किया, उसमें वे औपचारिक वातावरण में दिखाई देते हैं — पृष्ठभूमि में अमेरिकी झंडा और राष्ट्रपति पद की गरिमा को दर्शाती चमड़े की कुर्सी। वीडियो के दौरान उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“जनरेशन Z को मेरा धन्यवाद करना चाहिए, क्योंकि मैंने TikTok को बैन होने से बचाया।”
यह बयान सीधे उस दौर की याद दिलाता है जब ट्रंप प्रशासन ने TikTok पर राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे का हवाला देकर इसके प्रतिबंध की पहल की थी। विडंबना यह है कि अब वही ट्रंप उसी मंच का उपयोग कर अपनी राजनीतिक उपस्थिति को मज़बूत बना रहे हैं।
🧩 रणनीतिक दृष्टि से विश्लेषण
- युवा मतदाताओं पर फोकस:
अमेरिका की जनरेशन Z अब राजनीतिक विमर्श में एक प्रभावशाली शक्ति बन चुकी है। TikTok जैसे मंचों पर सक्रिय रहकर ट्रंप न सिर्फ इस वर्ग तक पहुँचना चाहते हैं, बल्कि उनकी भाषा और रुझान को समझने की कोशिश भी कर रहे हैं। - विरोध से अवसर तक की यात्रा:
ट्रंप ने एक समय TikTok को “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा” बताया था, लेकिन अब वही मंच उनके प्रचार का हथियार बन गया है। इससे वे खुद को “संरक्षक” और “व्यावहारिक नेता” की छवि में ढालने का प्रयास कर रहे हैं। - डिजिटल राजनीति का पुनर्परिभाषण:
ट्रंप का यह कदम पारंपरिक मीडिया से दूरी बनाकर डायरेक्ट कम्युनिकेशन मॉडल को बढ़ावा देता है, जहाँ नेता सीधे जनता से संवाद करता है, बिना किसी मध्यस्थ या संपादकीय नियंत्रण के।
🌏 वैश्विक परिप्रेक्ष्य और भारत के लिए सीख
यह घटना स्पष्ट करती है कि 21वीं सदी की राजनीति अब सोशल मीडिया की सीमाओं में बंधी नहीं, बल्कि उसी से संचालित हो रही है। भारत में TikTok प्रतिबंधित है, परंतु यहाँ भी नेताओं और दलों को यह समझना होगा कि युवाओं तक पहुँचने के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म कितने प्रभावी हो सकते हैं। ट्रंप का यह कदम एक संकेत है कि “डिजिटल उपस्थिति ही आधुनिक जनसंपर्क की नई भाषा है।”
🗣️ निष्कर्ष
डोनाल्ड ट्रंप का TikTok पदार्पण केवल एक वीडियो अपलोड नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्प्रवेश का प्रतीकात्मक ऐलान है। इस कदम से यह साबित होता है कि सोशल मीडिया अब सिर्फ प्रचार का साधन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद और जनमत निर्माण का सबसे शक्तिशाली औज़ार बन चुका है। आने वाले अमेरिकी चुनावों में यह रणनीति कितनी असरदार साबित होती है, यह आने वाला समय तय करेगा।