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🇮🇳 भारत के रक्षा क्षेत्र में यूनिकॉर्न की कमी: नवाचार की दिशा में एक मौन चुनौती


भारत आज वैश्विक स्टार्टअप मानचित्र पर एक उज्ज्वल नक्षत्र के रूप में उभर चुका है। फिनटेक, ई-कॉमर्स, हेल्थटेक और एडटेक जैसे क्षेत्रों में भारत के युवा उद्यमियों ने वह कर दिखाया है, जो कभी केवल सिलिकॉन वैली की पहचान हुआ करता था। 2025 तक देश में 100 से अधिक यूनिकॉर्न कंपनियाँ दर्ज हो चुकी हैं — लेकिन इस सुनहरे परिदृश्य में एक क्षेत्र ऐसा भी है, जहाँ अब तक कोई यूनिकॉर्न नहीं बना: रक्षा क्षेत्र (Defence Sector)


🛡️ रक्षा स्टार्टअप्स की वर्तमान तस्वीर

रक्षा मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 300 से अधिक रक्षा स्टार्टअप्स पंजीकृत हैं, जो ड्रोन तकनीक, साइबर सुरक्षा, AI आधारित युद्ध प्रणाली और सिमुलेशन जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। फिर भी, इनमें से कोई भी अब तक यूनिकॉर्न स्तर तक नहीं पहुँच सका।
इसका अर्थ यह नहीं कि संभावनाएँ नहीं हैं — बल्कि यह दर्शाता है कि यह क्षेत्र अभी अपने निर्णायक मोड़ पर है।


🔍 क्यों नहीं उभरे यूनिकॉर्न?

  1. उच्च प्रवेश अवरोध (Entry Barriers):
    रक्षा उत्पादन और अनुसंधान से जुड़ी परियोजनाएँ कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल, सरकारी स्वीकृतियों और लाइसेंसिंग की जटिल प्रक्रिया से गुजरती हैं। यह जटिलता युवा उद्यमियों को प्रारंभिक स्तर पर ही हतोत्साहित करती है।
  2. धीमी निवेश वापसी (Long ROI Cycle):
    निजी निवेशक आमतौर पर तेज़ रिटर्न वाले सेक्टर चुनते हैं। रक्षा स्टार्टअप्स में सरकारी खरीद प्रक्रिया, परीक्षण, और प्रोटोटाइप स्वीकृति के कारण वित्तीय वापसी में समय लगता है।
  3. सरकारी वर्चस्व (Public Dominance):
    भारत का रक्षा उद्योग ऐतिहासिक रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों — जैसे HAL, BEL, DRDO — के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। निजी क्षेत्र की भागीदारी अभी भी सीमित है।

🚀 अब भी है विशाल अवसर

भारत सरकार ने हाल के वर्षों में कई परिवर्तनकारी कदम उठाए हैं — जैसे Innovations for Defence Excellence (iDEX), Make-II Policy, और Defence Corridor Initiatives। इन कार्यक्रमों ने नवोदित स्टार्टअप्स को सैन्य नवाचार में प्रवेश का द्वार खोला है।
लेकिन यूनिकॉर्न स्तर तक पहुँचने के लिए और गहरे कदम उठाने होंगे:


🌍 वैश्विक अनुभव से सीख

इज़राइल, अमेरिका और फ्रांस में रक्षा स्टार्टअप्स को न केवल सरकारी अनुबंध मिलते हैं, बल्कि सेना और उद्योग के बीच सीधा संवाद होता है।
उदाहरण के लिए, इज़राइल की कंपनियाँ जैसे Rafael और Elbit Systems ने स्टार्टअप स्तर से ही सरकारी सहायता पाकर वैश्विक दिग्गज बनने का मार्ग तय किया।
भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़कर अपने स्टार्टअप्स को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धा के योग्य बना सकता है।


निष्कर्ष

भारत के युवा उद्यमी अंतरिक्ष से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक हर क्षेत्र में कमाल दिखा रहे हैं। अब समय है कि यह नवाचार ऊर्जा रक्षा क्षेत्र में भी झलके।
एक यूनिकॉर्न केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं होता — वह रणनीतिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी होता है।
यदि नीतिगत समर्थन, पूंजी निवेश और तकनीकी साझेदारी की सही दिशा तय की जाए, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत से पहला रक्षा यूनिकॉर्न जन्म लेगा — और यही होगा ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सच्चा शस्त्रबिंदु।


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