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🇮🇱 इज़राइल-गाज़ा संघर्ष: 7 अक्टूबर की त्रासदी और नेतन्याहू की दृढ़ घोषणा


7 अक्टूबर 2025 का दिन इज़राइल के इतिहास में गहरी पीड़ा और क्रोध का प्रतीक बन गया। इसी दिन हमास के सशस्त्र आतंकियों ने देश पर अप्रत्याशित हमला किया, जिसे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने “मानवता के विरुद्ध नरसंहार” बताया। इस हमले में सैकड़ों निर्दोष नागरिक मारे गए और लगभग 251 लोगों को गाज़ा पट्टी में बंधक बना लिया गया। यह घटना न केवल इज़राइल की सुरक्षा पर हमला थी, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की शांति के लिए भी गंभीर खतरे का संकेत बन गई।

नेतन्याहू का दृढ़ और भावनात्मक संदेश

हमले के बाद प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि यह संघर्ष केवल हमास से बदला लेने का नहीं, बल्कि इज़राइल के अस्तित्व और उसके भविष्य की रक्षा का युद्ध है। उन्होंने पीड़ितों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की और इस त्रासदी को “राष्ट्रीय आत्मा पर लगा गहरा घाव” बताया।
नेतन्याहू का स्वर भावनात्मक होने के साथ-साथ दृढ़ भी था—उन्होंने कहा कि “इज़राइल कभी झुकेगा नहीं, और यह युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक आतंक का हर ठिकाना समाप्त नहीं हो जाता।”

ईरान के प्रभाव को चुनौती देने की नीति

अपने बयान में नेतन्याहू ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संघर्ष गाज़ा तक सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने ईरान को “आतंकी अक्ष का केंद्र” बताते हुए कहा कि इज़राइल अब उसकी क्षेत्रीय गतिविधियों को रोकने के लिए कदम उठाएगा। इस बयान से यह संकेत मिला कि आने वाले समय में इज़राइल की सुरक्षा नीति केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर रणनीतिक और आक्रामक दिशा में आगे बढ़ेगी।

वैश्विक प्रतिक्रिया और मानवीय संकट

इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न की हैं। कई देशों ने इज़राइल के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया है, जबकि कुछ राष्ट्र गाज़ा में बढ़ते मानवीय संकट पर चिंता जता रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र, रेड क्रॉस और अन्य मानवीय संगठन लगातार बंधकों की सुरक्षित रिहाई और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील कर रहे हैं।
यह स्थिति वैश्विक राजनीति को एक नए नैतिक प्रश्न के सामने खड़ा करती है—क्या आतंक के विरुद्ध लड़ाई में मानवीय सरोकारों को बनाए रखा जा सकता है?

निष्कर्ष: एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा इज़राइल

7 अक्टूबर की घटना ने इज़राइल को एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर ला दिया है, जहाँ उसे सुरक्षा और अस्तित्व दोनों की लड़ाई एक साथ लड़नी पड़ रही है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू का संदेश केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि एक राष्ट्र को एकजुट करने का भावनात्मक आह्वान है।
यह आह्वान केवल वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी है—कि इज़राइल कभी अपने दुश्मनों के सामने झुकेगा नहीं, चाहे संघर्ष कितना ही कठिन क्यों न हो।


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