
भारत में सोने की कीमत ने इतिहास रच दिया है — अब यह ₹1.25 लाख प्रति 10 ग्राम के पार पहुंच चुकी है। यह केवल एक वित्तीय समाचार नहीं, बल्कि एक व्यापक आर्थिक और राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है। विपक्ष ने इस बढ़ोतरी को सरकार की नीतियों की विफलता से जोड़ते हुए तीखे प्रश्न खड़े किए हैं।
📊 निवेश की मनोवृत्ति और आर्थिक परिदृश्य
- भारतीय समाज में सोना सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक है।
- हाल के महीनों में वैश्विक अस्थिरता, डॉलर की मजबूती और घरेलू मुद्रास्फीति ने निवेशकों को सोने की ओर मोड़ा है।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग में उछाल के कारण भारत में भी इसकी कीमतें तेजी से बढ़ी हैं।
🏛️ राजनीति में सोना बना नया मुद्दा
- समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि सोने की बढ़ती कीमतें “भ्रष्टाचार से अर्जित धन के गोल्ड रूपांतरण” का परिणाम हैं।
- उन्होंने कहा कि “महंगाई का यह नया अध्याय सरकार की नीतिगत विफलता को दर्शाता है।”
- भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई, परंतु पार्टी प्रवक्ताओं ने पहले ऐसे बयानों को “राजनीतिक भ्रम फैलाने की कोशिश” बताया है।
📉 अर्थशास्त्रीय विश्लेषण
- भारतीय रिज़र्व बैंक ने हालिया मौद्रिक नीति में ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखा, जिससे बाज़ार की तरलता बनी रही।
- रुपये की डॉलर के मुकाबले कमजोरी ने सोने के आयात को और महंगा कर दिया।
- साथ ही, त्योहारों और शादियों के मौसम में बढ़ी घरेलू मांग ने कीमतों को नए शिखर तक पहुंचा दिया।
🧭 सामाजिक और व्यावहारिक असर
- मध्यम वर्ग के लिए सोना अब “लग्जरी संपत्ति” बनता जा रहा है।
- आभूषण कारोबार पर इसका सीधा असर पड़ा है — बिक्री में कमी और उपभोक्ताओं की हिचक बढ़ी है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां सोना अब भी सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है, वहां इसकी पहुंच सीमित होती जा रही है।
🗣️ निष्कर्ष
सोने की यह ऐतिहासिक छलांग केवल आर्थिक उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं है। यह एक समग्र परिघटना है — जिसमें आर्थिक रणनीतियाँ, वैश्विक बाज़ार, राजनीतिक बयानबाज़ी और सामाजिक व्यवहार सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं।
जहां एक ओर यह निवेशकों के लिए भरोसे का संकेत है, वहीं दूसरी ओर आम नागरिक के लिए यह महंगाई की नई चुनौती बनकर उभरी है।