HIT AND HOT NEWS

🇮🇳 स्वदेशी आंदोलन: आत्मनिर्भरता की ज्वाला से ‘विकसित भारत’ तक की यात्रा


भारत का स्वदेशी आंदोलन वर्ष 1905 में उस समय शुरू हुआ जब बंगाल के विभाजन के विरोध में देशभर में अंग्रेजी वस्त्रों और उत्पादों के बहिष्कार का स्वर उठने लगा। यह आंदोलन केवल विदेशी वस्तुओं के विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि यह भारतवासियों में आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान और राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रज्वलित करने वाला सामाजिक–आर्थिक आंदोलन था।

इस आंदोलन ने यह संदेश दिया कि भारत की शक्ति बाहरी सहायता में नहीं, बल्कि अपने श्रम, अपनी भूमि और अपने उत्पादों में निहित है। खादी का चर्खा इस विचार का प्रतीक बन गया—जो एक ओर भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर रहा था और दूसरी ओर स्वतंत्रता की चेतना को बल दे रहा था।

आज, जब भारत 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है, तब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने उसी आत्मनिर्भरता की भावना को नए युग में पुनर्जीवित किया है। उनके नेतृत्व में आरंभ हुआ #VocalForLocal और #AtmanirbharBharat अभियान आधुनिक भारत का स्वदेशी आंदोलन बन चुका है—जो स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने और कारीगरों, उद्यमियों तथा नवाचार को सशक्त बनाने की दिशा में अग्रसर है।

इन अभियानों ने न केवल आर्थिक स्वावलंबन को प्रोत्साहित किया है, बल्कि युवाओं में “Made in India, Made for the World” की भावना भी जगाई है। यही भावना आगे चलकर “#ViksitBharat” की परिकल्पना को साकार करने का मार्ग प्रशस्त कर रही है।

स्वदेशी आंदोलन के नायकों ने जिस आत्मबल, त्याग और राष्ट्रप्रेम से स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी थी, वही प्रेरणा आज के भारत को आत्मनिर्भर, प्रगतिशील और वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर कर रही है।


🕊️ निष्कर्ष:
स्वदेशी आंदोलन केवल इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि भारत के विकास की आत्मा है। 1905 की वह चिंगारी आज भी भारत के हर नागरिक में जीवित है—जब वह “स्थानीय को वैश्विक” बनाने की राह पर आगे बढ़ रहा है। यही सच्चा सम्मान है उन वीरों का जिन्होंने आत्मनिर्भर भारत का सपना देखा था।


Exit mobile version