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🌿 सोफिया कोर्रादी: यूरोपीय शिक्षा की आधारशिला रखने वाली ‘मम्मा एरास्मस’ को नमन


यूरोप की सांस्कृतिक और शैक्षिक एकता की प्रतीक, महान शिक्षाविद् सोफिया कोर्रादी अब इस दुनिया में नहीं रहीं। उनके निधन पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी और उन्हें स्नेहपूर्वक “मम्मा एरास्मस” कहा — वह नाम जो यूरोप के लाखों युवाओं के दिलों में आशा और अवसर का प्रतीक बन चुका है।


🌍 वह सपना जिसने यूरोप को जोड़ा

सोफिया कोर्रादी ने दशकों पहले एक ऐसा विचार रखा था जिसमें यूरोप के युवा सीमाओं से परे जाकर एक-दूसरे से सीखें, संवाद करें और विविध संस्कृतियों को समझें। यह विचार ही आगे चलकर एरास्मस कार्यक्रम का स्वरूप बना — एक ऐसा उपक्रम जिसने शिक्षा को राष्ट्रों के बीच जोड़ने का माध्यम बना दिया।

उनका विश्वास था कि जब विद्यार्थी एक-दूसरे के समाजों और मूल्यों को समझेंगे, तो यूरोप न केवल एक आर्थिक संघ रहेगा बल्कि एक संस्कृति और विचार की साझा भूमि भी बनेगा।


🎓 एरास्मस: ज्ञान से एकता तक का सफर

1987 में प्रारंभ हुआ एरास्मस कार्यक्रम आज यूरोपीय संघ की सबसे सफल और लोकप्रिय पहल मानी जाती है। यह विद्यार्थियों को अन्य सदस्य देशों में जाकर अध्ययन करने, अनुभव प्राप्त करने और नई संस्कृतियों को आत्मसात करने का अवसर देता है।

इस कार्यक्रम ने शिक्षा को सीमाओं से मुक्त कर दिया — और एक नई यूरोपीय पीढ़ी को जन्म दिया जो विविधता में एकता के आदर्श को जीती है। लाखों युवाओं के करियर, सोच और जीवन को बदल देने वाले इस आंदोलन के पीछे थीं — सोफिया कोर्रादी, एक दूरदर्शी विचारक और शिक्षाविद्।


🇫🇷 राष्ट्रपति मैक्रों की भावनात्मक प्रतिक्रिया

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपने संदेश में लिखा:

“सोफिया कोर्रादी अब हमारे बीच नहीं रहीं।
उन्होंने एक ऐसे यूरोपीय युवा का सपना देखा था जो विविधताओं से समृद्ध और अनुभवों से एकजुट हो।
लाखों छात्रों ने उनके कारण अपने जीवन का नया क्षितिज पाया।
‘मम्मा एरास्मस’ को नमन — जिनका सपना आज भी हमारे यूरोप को दिशा दे रहा है।”

यह शब्द केवल संवेदना नहीं, बल्कि उस विचार का सम्मान हैं जिसने यूरोप को संवाद, शिक्षा और साझेदारी की डोर से बांधा।


🌱 एक जीवंत विरासत

सोफिया कोर्रादी की सोच किसी कार्यक्रम या नीति तक सीमित नहीं थी — वह एक मानवीय दृष्टिकोण थी, जिसमें शिक्षा को संस्कृतियों के बीच पुल माना गया। उन्होंने यह दिखाया कि ज्ञान का आदान-प्रदान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि विचारों और अनुभवों के संगम से होता है।

आज भी यूरोपीय नीतियों में उनकी दृष्टि जीवित है — और हर वह छात्र जो एरास्मस के माध्यम से नई धरती पर कदम रखता है, उनकी विरासत को आगे बढ़ाता है।


🔚 निष्कर्ष

सोफिया कोर्रादी का जीवन एक उद्देश्य था — शिक्षा के माध्यम से एकता का निर्माण। उन्होंने जो सपना देखा, वह आज यूरोप की पहचान बन चुका है।

हर वह मुस्कान जो किसी विदेशी विश्वविद्यालय के गलियारे में खिलती है, हर वह मित्रता जो भाषाओं के पार पनपती है — वह सब उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण है।

मम्मा एरास्मस” को विनम्र श्रद्धांजलि।
उनका सपना अब यूरोप के हर युवा का भविष्य है।


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