
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई ने हाल ही में अपने बयान में स्पष्ट किया कि अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु कार्यक्रम में लगातार हस्तक्षेप अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन की यह नीति न केवल अनुचित है बल्कि एक स्वतंत्र राष्ट्र की संप्रभुता पर सीधा आघात भी है। यह बयान उस व्यापक वैश्विक बहस का हिस्सा है जिसमें शक्ति संतुलन और न्याय के सिद्धांतों को बार-बार चुनौती दी जाती रही है।
🔬 परमाणु तकनीक: आत्मनिर्भरता की राह या संदेह का विषय?
ईरान का परमाणु कार्यक्रम पिछले कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय विवादों के केंद्र में रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने इसे एक संभावित सुरक्षा जोखिम के रूप में चित्रित किया है, जबकि ईरान का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल ऊर्जा उत्पादन, चिकित्सा अनुसंधान और वैज्ञानिक प्रगति है।
खामेनेई ने अपने भाषण में सवाल उठाया — “क्या किसी राष्ट्र को अपनी वैज्ञानिक प्रगति के लिए अनुमति मांगनी चाहिए?” यह प्रश्न केवल ईरान तक सीमित नहीं, बल्कि उन सभी देशों के लिए प्रासंगिक है जो तकनीकी स्वतंत्रता की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
⚠️ अमेरिकी नीति: दबाव और प्रतिबंधों का चक्र
अमेरिका ने ईरान पर वर्षों से कठोर आर्थिक प्रतिबंध, राजनयिक दबाव, और परमाणु समझौते से एकतरफा वापसी जैसे कदम उठाए हैं। इसके साथ ही, उसने ईरानी वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योगों को निशाना बनाकर उसके विकास को रोकने की कोशिश की है।
खामेनेई ने इस नीति को “अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध और साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का प्रतीक” बताया। यह रुख वैश्विक व्यवस्था में उस असंतुलन को उजागर करता है जहाँ कुछ शक्तिशाली देश अपने हितों को “वैश्विक नियम” के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
🌍 दोहरा मानदंड और वैश्विक न्याय की चुनौती
दुनिया में कई शक्तियाँ — अमेरिका, फ्रांस, रूस, चीन, भारत, इज़राइल तक — परमाणु तकनीक का प्रयोग करती हैं, किंतु केवल ईरान को संदेह के घेरे में रखा जाता है। यही दोहरे मानदंड अंतरराष्ट्रीय संबंधों में असमानता की सबसे बड़ी जड़ हैं।
खामेनेई का संदेश साफ़ है — यदि परमाणु तकनीक मानव विकास के लिए है, तो हर राष्ट्र को उसका अधिकार समान रूप से मिलना चाहिए। किसी भी देश को केवल राजनीतिक कारणों से वंचित नहीं किया जा सकता।
🗣️ निष्कर्ष: सम्मान, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की दिशा में
ईरान का परमाणु कार्यक्रम केवल एक वैज्ञानिक पहल नहीं, बल्कि उसकी राष्ट्रीय गरिमा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है। अयातुल्ला खामेनेई का बयान इस दृढ़ संकल्प को दोहराता है कि ईरान किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकेगा नहीं।
यह रुख न केवल ईरान की संप्रभुता की रक्षा का प्रतीक है, बल्कि उन सभी राष्ट्रों के लिए प्रेरणा भी है जो बाहरी प्रभावों से मुक्त होकर अपने विकास की दिशा तय करना चाहते हैं।