
दिल्ली की जीवनरेखा कही जाने वाली यमुना नदी आज गहरी पीड़ा में है। उसका जल, जो कभी निर्मल और जीवनदायी था, अब रासायनिक झाग, कचरे और विषैले अपशिष्टों से भर चुका है। यह स्थिति अब केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं रही — बल्कि यह धार्मिक आस्था, सामाजिक ज़िम्मेदारी और मानवीय संवेदना का प्रश्न बन चुकी है।
हाल ही में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने एक ट्वीट में इस विषय को प्रमुखता से उठाते हुए कहा कि यमुना में गिरते औद्योगिक रसायन न केवल जल को जहरीला बना रहे हैं, बल्कि यह मानव शरीर और समाज दोनों को भीतर तक प्रभावित कर रहे हैं।
🌀 यमुना का प्रवाह और उसका व्यापक असर
दिल्ली से बहती हुई यमुना आगे मथुरा, आगरा, इटावा और प्रयागराज जैसे प्रमुख शहरों से गुजरती है और अंततः गंगा में समा जाती है। यमुना का यह प्रदूषित जल जब गंगा से मिलता है, तो वह गंगा की पवित्रता को भी प्रभावित करता है। परिणामस्वरूप, वाराणसी और उससे आगे बसे करोड़ों लोग दूषित जल के दुष्प्रभावों से जूझ रहे हैं।
यह संकट केवल एक नदी का नहीं, बल्कि हमारी आस्था, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक धरोहर का भी संकट है।
⚠️ रासायनिक विष और स्वास्थ्य पर प्रहार
दिल्ली और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले अपशिष्ट, बिना किसी शोधन के सीधे यमुना में डाले जा रहे हैं। परिणामस्वरूप, जल में भारी धातुएँ और विषैले रासायनिक यौगिक घुल रहे हैं।
इनसे उत्पन्न दुष्प्रभाव हैं —
- त्वचा संबंधी रोग
- पाचन तंत्र की समस्याएँ
- जलजनित संक्रामक बीमारियाँ
त्योहारों के समय जब लोग श्रद्धा से यमुना में स्नान करते हैं, तो यह प्रदूषण धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं को भी गहराई से आहत करता है।
💰 सरकारी योजनाएँ और अनुत्तरित प्रश्न
अखिलेश यादव ने यह प्रश्न उठाया कि नदियों की सफाई के नाम पर जारी नमामि गंगे और अन्य योजनाओं के अरबों रुपये आखिर कहाँ खर्च हो रहे हैं?
वर्षों से सफाई अभियानों और बजट घोषणाओं के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं दिख रहा है।
त्योहारों के अवसर पर तो सरकार को कम-से-कम जल को अस्थायी रूप से शुद्ध करने और स्थानीय सफाई व्यवस्था मजबूत करने की जिम्मेदारी निभानी ही चाहिए थी।
🌱 नदी: जल नहीं, जीवन और भावना
भारत में नदियाँ केवल प्राकृतिक जलस्रोत नहीं हैं, वे हमारे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अस्तित्व का प्रतीक हैं।
यमुना और गंगा जैसी नदियों को “मां” कहा जाता है — और जब इनकी गोद प्रदूषण से भर जाती है, तो यह हमारी सामूहिक संवेदना पर चोट करती है।
🔍 समाधान की दिशा
इस गंभीर स्थिति से उबरने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे:
- औद्योगिक अपशिष्टों के शोधन संयंत्र (Effluent Treatment Plants) को अनिवार्य और कार्यक्षम बनाया जाए।
- सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की क्षमता और कवरेज बढ़ाई जाए।
- त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के समय विशेष सफाई अभियान चलाए जाएँ।
- जनजागरूकता अभियान के माध्यम से लोगों को यह समझाया जाए कि नदी में कचरा या धार्मिक सामग्री डालना पाप है, पूजा नहीं।
✊ निष्कर्ष: यमुना की पुकार
यमुना और गंगा की शुद्धता सिर्फ सरकारी नीति का दायरा नहीं, बल्कि हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।
जब तक हम नदियों को केवल “जलधारा” मानते रहेंगे, तब तक उनका दर्द नहीं समझ पाएंगे।
हमें उन्हें अपने जीवन, संस्कृति और चेतना का हिस्सा मानकर पुनर्जीवित करना होगा।
यमुना केवल एक नदी नहीं — वह हमारी सांस्कृतिक आत्मा की धारा है, जिसे बचाना हमारे अस्तित्व की रक्षा करना है।