
भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार कोई नई कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसी गाथा है जो हर सत्ता परिवर्तन के साथ नए रूप में सामने आती है। परंतु जब यह भ्रष्टाचार सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन जाए, तो यह केवल नैतिक पतन नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा आघात है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में अपने एक ट्वीट में इसी प्रवृत्ति पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “भ्रष्टाचार अब एक संगठित परंपरा बन चुका है” — एक ऐसी परंपरा, जो शासन की हर परत में अपनी जड़ें जमा चुकी है।
🎯 असली भ्रष्टाचार कहाँ है — नीचे नहीं, ऊपर
अखिलेश यादव का कहना है कि भ्रष्टाचार की जड़ें ज़मीनी स्तर पर नहीं, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर हैं। जो लोग नीचे काम करते हैं, वे केवल उस व्यवस्था का हिस्सा हैं, जिसे ऊपर से नियंत्रित किया जाता है। यह तंत्र दरअसल “ऊपर के आदेश” से चलता है, और हर रिश्वत या घूस का संबंध किसी न किसी बड़ी रणनीति से जुड़ा होता है।
उनके मुताबिक, विभागों और संस्थानों में फैल रहा भ्रष्टाचार किसी व्यक्तिगत लालच का परिणाम नहीं, बल्कि सत्ता संघर्ष का औजार है — एक ऐसी दौड़ जिसमें पैसों का प्रवाह “कुर्सी की मजबूती” तय करता है।
💰 ‘ग्रैंड ट्रेजरी’ — सत्ता का गुप्त खजाना
अखिलेश यादव के ट्वीट में एक प्रतीकात्मक शब्द सामने आया — “ग्रैंड ट्रेजरी”। यह उस गुप्त कोष का प्रतीक है, जिसे नेता चुनावी तैयारी, लॉबिंग, और सत्ता के भीतर पकड़ मजबूत करने के लिए बनाते हैं। यह कोष जनता के कर के पैसे से तो नहीं बनता, परंतु जनता की ही मेहनत और संसाधनों से निकले धन के दुरुपयोग से फलता-फूलता है।
राजनीतिक गलियारों में माना जाता है कि जो व्यक्ति इस “छिपे हुए खजाने” को सबसे कुशलता से संभाल लेता है, वही शीर्ष सत्ता तक पहुँचने में सफल होता है।
🔍 पारदर्शिता की कमी और जनता पर बोझ
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा शिकार आम नागरिक होता है। जब सरकारी योजनाएँ धीमी पड़ती हैं, जब महंगाई बढ़ती है, और जब आम सेवाओं में गिरावट आती है — तो यह उसी “संगठित भ्रष्टाचार” का परिणाम होता है।
जनता टैक्स देती है विकास के लिए, लेकिन वह धन अक्सर राजनीतिक तैयारी और सत्ता की प्रतिस्पर्धा में खप जाता है। पारदर्शिता की जगह गोपनीयता, और जवाबदेही की जगह “जुगाड़” ने ले ली है।
📽️ “क़र्रर दौड़ाने का खेल” — व्यंग्य में सच्चाई
अखिलेश यादव द्वारा साझा किए गए वीडियो में दिखाया गया वाक्य — “क़र्रर दौड़ाने का खेल” — भारतीय राजनीति की वास्तविकता का व्यंग्यात्मक चित्रण है। यह दर्शाता है कि सत्ता की इस अंधी दौड़ में न तो सिद्धांत बचते हैं, न आदर्श, और न ही जनहित।
आगे बढ़ता वही है जो अधिक पूंजी और प्रभाव जुटा सके, चाहे उसके स्रोत वैध हों या अवैध। यह राजनीति की वह सच्चाई है जो जनता के विश्वास को धीरे-धीरे खोखला कर रही है।
✍️ निष्कर्ष
जब भ्रष्टाचार एक आदत नहीं, बल्कि सत्ता की रणनीति बन जाए — तब लोकतंत्र केवल नाम भर रह जाता है। अखिलेश यादव का यह बयान महज़ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि अगर हमने इस “संस्थागत भ्रष्टाचार” को नहीं रोका, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल एक खोखला लोकतंत्र और टूटी हुई नैतिकता विरासत में मिलेगी।