
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों पर चढ़ता कर्ज सिर्फ एक आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता का प्रतीक बन गया है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सेविला फोरम ऑन डेट में इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए कहा—
“कर्ज को बाधा नहीं, अवसर बनना चाहिए।”
उनका यह कथन वैश्विक वित्तीय ढांचे में सुधार और नैतिक संतुलन की सशक्त मांग के रूप में देखा जा रहा है।
🌍 विकासशील देशों की सच्चाई
- अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक देश कर्ज के गहरे जाल में फंसे हुए हैं।
- इन देशों को अक्सर अपने नागरिकों की बुनियादी ज़रूरतें — जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और खाद्य सुरक्षा — और विदेशी कर्ज चुकाने के बीच कठिन चुनाव करना पड़ता है।
- अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों द्वारा निर्धारित उच्च ब्याज दरें और कठोर नीतियाँ उनके विकास को सीमित करती हैं और आत्मनिर्भरता की राह में अवरोध बनती हैं।
💬 संयुक्त राष्ट्र का रुख
गुटेरेस ने सेविला फोरम में दो टूक कहा —
“किसी देश को अपने लोगों की सेवा और कर्ज चुकाने के बीच चुनाव करने की स्थिति में नहीं आना चाहिए। कर्ज विकास का माध्यम होना चाहिए, न कि गुलामी की बेड़ी।”
यह कथन वैश्विक आर्थिक नीति में न्याय, नैतिकता और मानवीय दृष्टिकोण की जरूरत को उजागर करता है।
📊 सेविला फोरम ऑन डेट: उद्देश्य और प्रासंगिकता
सेविला फोरम का मकसद था — वित्तीय न्याय की दिशा में ठोस समाधान तलाशना।
यहां नीतिनिर्माताओं, अर्थशास्त्रियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वित्तीय विशेषज्ञों ने मिलकर इस बात पर चर्चा की कि कैसे कर्ज को विकास के उपकरण के रूप में पुनर्परिभाषित किया जा सकता है।
मुख्य बिंदु रहे:
- कर्ज पुनर्गठन की नई रणनीतियाँ
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग के मानवीय मॉडल
- स्थायी विकास के लिए निवेश आधारित दृष्टिकोण
🔍 समाधान की संभावनाएँ
- कर्ज पुनर्गठन (Debt Restructuring):
कर्ज की अदायगी की शर्तें और समयसीमा को इस तरह से पुनर्निर्धारित किया जाए कि देश अपनी विकास प्राथमिकताओं को संतुलित रूप से आगे बढ़ा सकें। - न्यायसंगत ब्याज दरें:
विकासशील देशों को दिए जाने वाले ऋणों पर ब्याज दरें वास्तविक आर्थिक क्षमता के अनुरूप तय की जाएं। - वैश्विक सहयोग और सुधार:
IMF और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं को अपने दृष्टिकोण में अधिक मानवीय और लचीला रुख अपनाना होगा। - स्थायी विकास में निवेश:
कर्ज की राशि ऐसी परियोजनाओं में लगाई जाए जो रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और दीर्घकालिक सामाजिक स्थिरता को बढ़ावा दें।
🧭 निष्कर्ष
कर्ज का प्रश्न सिर्फ आर्थिक गणना का नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय संवेदनशीलता का विषय है। जब कोई राष्ट्र अपने नागरिकों की जरूरतों की कीमत पर ऋण चुकाने को मजबूर हो जाता है, तो यह वैश्विक व्यवस्था की असफलता का द्योतक है।
संयुक्त राष्ट्र की पहल और सेविला फोरम जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच इस असंतुलन को चुनौती देते हुए हमें यह याद दिलाते हैं कि —
“वित्तीय न्याय केवल नीति नहीं, मानवता की आवश्यकता है।”