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🌍 REsourceEU: यूरोपीय संघ की नई पहल — रणनीतिक खनिजों की आत्मनिर्भरता की ओर एक निर्णायक कदम


21वीं सदी की औद्योगिक प्रगति और हरित ऊर्जा क्रांति की नींव उन दुर्लभ और महत्त्वपूर्ण खनिजों पर टिकी है जिन्हें “क्रिटिकल रॉ मटेरियल्स” कहा जाता है — जैसे लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स। यही तत्व बैटरियों, सेमीकंडक्टर्स, सौर पैनलों और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे अत्याधुनिक उत्पादों की रीढ़ हैं। इनके बिना डिजिटल और हरित परिवर्तन की कल्पना अधूरी है।

🇪🇺 यूरोपीय संघ की नई दिशा: REsourceEU

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने हाल ही में बर्लिन ग्लोबल डायलॉग सम्मेलन में एक ऐतिहासिक पहल की घोषणा की — REsourceEU। यह कार्यक्रम यूरोप को महत्वपूर्ण कच्चे संसाधनों की आपूर्ति में आत्मनिर्भर बनाने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में स्थायित्व प्रदान करने के लिए तैयार किया गया है।

🔑 REsourceEU के पाँच प्रमुख स्तंभ

  1. स्थानीय उत्पादन को सशक्त करना:
    यूरोपीय संघ अपने सदस्य देशों में खनन और प्रसंस्करण परियोजनाओं में निवेश बढ़ाकर घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करेगा।
  2. संयुक्त खरीद व्यवस्था:
    सभी सदस्य राष्ट्र मिलकर संसाधनों की सामूहिक खरीद करेंगे, जिससे लागत घटेगी और आपूर्ति अधिक स्थिर रहेगी।
  3. रणनीतिक भंडारण (स्टॉकपाइलिंग):
    भविष्य में संभावित आपूर्ति संकटों से बचाव के लिए इन खनिजों का संरचित भंडारण किया जाएगा।
  4. रीसायक्लिंग और पुनः उपयोग:
    प्रयुक्त उपकरणों, बैटरियों और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से मूल्यवान तत्वों की पुनर्प्राप्ति हेतु नवीन तकनीकों में निवेश किया जाएगा।
  5. अंतरराष्ट्रीय साझेदारी:
    अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के देशों के साथ दीर्घकालिक सहयोग समझौते किए जाएंगे, ताकि विविध स्रोतों से स्थायी आपूर्ति सुनिश्चित हो।

🌐 वैश्विक परिप्रेक्ष्य और भारत के लिए संकेत

REsourceEU केवल यूरोप की औद्योगिक नीति नहीं है — यह एक वैश्विक संदेश है। यह बताता है कि आर्थिक सुरक्षा अब केवल ऊर्जा पर नहीं, बल्कि रणनीतिक खनिजों की उपलब्धता पर भी निर्भर करेगी।
भारत जैसे उभरते देश, जो इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा और डिजिटल निर्माण में तेजी से निवेश कर रहे हैं, उन्हें भी अपनी “क्रिटिकल मटेरियल रणनीति” तैयार करनी होगी — ताकि भविष्य की तकनीकी निर्भरता किसी एक देश या क्षेत्र पर न रहे।

🔍 निष्कर्ष

REsourceEU यूरोपीय संघ की दूरदर्शी सोच का परिचायक है। यह पहल दर्शाती है कि आधुनिक उद्योगों की मजबूती केवल तकनीकी नवाचार से नहीं, बल्कि उन संसाधनों से आती है जो धरती की गहराइयों से निकले हैं।
यह कदम न केवल वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को स्थिर करेगा, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और औद्योगिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक नए युग की शुरुआत भी करेगा।


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