
27 अक्टूबर 2023 को अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (International Religious Freedom Act) के 27 वर्ष पूरे हुए। इस अवसर पर अमेरिकी नेतृत्व ने पुनः यह दोहराया कि “धर्म और आस्था की स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं, बल्कि मानवता का जन्मसिद्ध अधिकार है।”
अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो ने कहा — “ईश्वर में विश्वास एक स्वतंत्रता है, कोई प्रतिबंध नहीं।” यह कथन वैश्विक विमर्श को यह सोचने पर विवश करता है कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता आज भी समान रूप से सुरक्षित है या यह केवल कूटनीति का विषय बनकर रह गई है।
📜 अधिनियम की उत्पत्ति और उद्देश्य
1998 में अमेरिकी कांग्रेस ने इस अधिनियम को पारित किया था ताकि विश्वभर में धर्म या आस्था के आधार पर हो रहे उत्पीड़न पर नज़र रखी जा सके। इसके तीन प्रमुख उद्देश्य थे:
- धार्मिक दमन की घटनाओं की निगरानी और रिपोर्टिंग
- ऐसी घटनाओं पर अमेरिकी विदेश नीति की स्पष्ट प्रतिक्रिया
- उन देशों की पहचान जो गंभीर धार्मिक उत्पीड़न में संलिप्त हैं
इस कानून के अंतर्गत “Countries of Particular Concern (CPC)” की सूची बनाई जाती है, जिसमें ऐसे देश शामिल किए जाते हैं जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन होता है।
🌍 वैश्विक राजनीति में अमेरिका की भूमिका
USCIRF (अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग) समय-समय पर विभिन्न देशों को CPC सूची में शामिल करने की सिफारिश करता है। हाल के वर्षों में उसने नाइजीरिया, भारत, वियतनाम और इरिट्रिया जैसे देशों के नाम सुझाए, परंतु अमेरिकी प्रशासन ने सभी सिफारिशें स्वीकार नहीं कीं।
इससे यह प्रश्न उभरता है — क्या धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा केवल बयानबाज़ी तक सीमित है? या फिर यह अमेरिकी विदेश नीति के रणनीतिक हितों के अनुरूप व्याख्यायित की जा रही है?
🗣️ जनमत और सामाजिक प्रतिक्रिया
मार्को रुबियो के ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक बहस छिड़ गई।
कई नागरिकों ने कहा कि “धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ सभी मतों का समान सम्मान है, न कि किसी विशेष विश्वास का संरक्षण।”
वहीं कुछ लोगों ने इस पर व्यंग्य करते हुए लिखा — “जब किसी की आस्था दूसरे की आज़ादी पर हावी हो जाए, तब वह स्वतंत्रता नहीं, दमन बन जाती है।”
इन प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट हुआ कि धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा केवल नीति नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से भी जुड़ा हुआ है।
🔍 निष्कर्ष: समानता के दायरे में स्वतंत्रता
धर्म या आस्था की स्वतंत्रता केवल प्रार्थना करने का अधिकार नहीं, बल्कि सोचने, असहमत होने और अपने विश्वास को व्यक्त करने की आज़ादी भी है।
यदि कोई सरकार इसे एक धर्म या विचारधारा तक सीमित करती है, तो वह स्वतंत्रता नहीं, बल्कि पक्षपात कहलाती है।
IRF Act की वर्षगांठ हमें यह स्मरण कराती है कि धार्मिक स्वतंत्रता किसी देश या समुदाय की दया नहीं — बल्कि पूरी मानवता की साझा जिम्मेदारी है।
इसे राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर, समानता और सह-अस्तित्व के सिद्धांतों के तहत लागू करना ही सच्ची स्वतंत्रता की पहचान है।