
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक उल्लेखनीय फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में केवल हाइमन (कौमार्य झिल्ली) के फटने या न फटने को अपराध का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने सुनाया, जिसने इस संवेदनशील विषय पर भारतीय न्यायशास्त्र को नई दिशा दी है।
🔍 मामला क्या था?
यह प्रकरण एक नाबालिग पीड़िता से संबंधित था, जिसमें निचली अदालत ने आरोपी को पॉक्सो अधिनियम की धारा 376(2)(f) और धारा 5(m) के तहत दोषी ठहराया था। आरोपी ने उच्च न्यायालय में अपील करते हुए यह दलील दी कि चिकित्सकीय रिपोर्ट में हाइमनल टियर न पाए जाने से वह निर्दोष साबित होता है।
हालांकि, न्यायालय ने यह तर्क सिरे से खारिज करते हुए कहा कि केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर यौन उत्पीड़न के आरोपों को नकारा नहीं जा सकता।
🧩 न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ
- चिकित्सीय साक्ष्य की सीमाएँ:
अदालत ने कहा कि हाइमन की स्थिति कई कारणों से प्रभावित हो सकती है — जैसे खेलकूद, साइकिल चलाना, या शारीरिक गतिविधियाँ। इसलिए इसका फटना या न फटना यौन उत्पीड़न का निर्णायक संकेत नहीं है। - पीड़िता की गवाही सर्वोपरि:
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही स्पष्ट, सुसंगत और विश्वसनीय हो, तो वह अपने आप में पर्याप्त प्रमाण हो सकती है। न्याय केवल तकनीकी रिपोर्टों पर आधारित नहीं होना चाहिए। - समग्र मूल्यांकन की आवश्यकता:
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता की मानसिक स्थिति, सामाजिक संदर्भ, और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को साथ में देखकर निर्णय देना अधिक न्यायसंगत होगा।
🌍 इस निर्णय का महत्व
यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में पीड़िता-केंद्रित दृष्टिकोण को मजबूत करता है। अब यह स्पष्ट संदेश जाता है कि न्याय केवल चिकित्सीय परीक्षणों पर निर्भर नहीं हो सकता, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, अनुभवों और विश्वसनीय गवाही को समान महत्व देना होगा।
यह निर्णय जांच एजेंसियों और अदालतों को यौन अपराधों के मामलों में अधिक वैज्ञानिक, संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।
💬 समाज के लिए संदेश
यह फैसला समाज को यह सिखाता है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़िता की गरिमा और विश्वास को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।
न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने का माध्यम है कि मानवता और संवेदना की रक्षा हो सके।
निष्कर्ष:
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय विधि व्यवस्था में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है, जो बताता है कि न्याय तभी पूर्ण होता है जब वह तथ्यों और संवेदनाओं दोनों का संतुलन बनाए रखे।