
बिहार, जो कभी नालंदा और विक्रमशिला जैसे ज्ञान के प्राचीन केंद्रों के लिए विश्वप्रसिद्ध था, आज शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मानव विकास के मूल स्तंभों पर गहरे संकट से गुजर रहा है। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा साझा किए गए आंकड़ों ने इस सच्चाई को और स्पष्ट कर दिया है। बिहार के युवाओं से संवाद के दौरान उन्होंने जो सवाल उठाए, वे केवल राजनीतिक नारे नहीं, बल्कि समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं।
📚 शिक्षा: भविष्य की नींव हिलती हुई
बिहार की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से अव्यवस्थित और असंतुलित रही है। नवीनतम आँकड़े बताते हैं कि:
- कक्षा 9–10 में छात्रों की ड्रॉपआउट दर के मामले में बिहार 29 में से 27वें स्थान पर है।
- कक्षा 11–12 में नामांकन दर के मामले में राज्य 28वें स्थान पर है।
- महिला साक्षरता दर के लिहाज से भी बिहार 28वें स्थान पर है।
ये आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि शिक्षा न तो युवाओं को जोड़ पा रही है, न ही उन्हें टिकाए रख पा रही है। विशेषकर, लड़कियों की शिक्षा की स्थिति सामाजिक और आर्थिक विषमता को और गहरा कर रही है।
👷♂️ रोजगार: पलायन की विवशता
बिहार के युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की है। सीमित अवसर और कमजोर औद्योगिक ढांचा युवाओं को अपने राज्य से बाहर जाने पर मजबूर कर रहा है।
- कुल रोजगार दर में बिहार का स्थान 21वां है।
- उद्योग और विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार सृजन के मामले में बिहार अंतिम (29वें) स्थान पर है।
इस स्थिति ने न केवल राज्य के आर्थिक विकास को बाधित किया है, बल्कि आत्मनिर्भरता की भावना को भी कमजोर किया है। कौशल विकास और औद्योगिक निवेश की कमी युवाओं की क्षमता को उपयोग में लाने में बड़ी बाधा बनी हुई है।
🏥 स्वास्थ्य: एक गहरी मानवीय विफलता
स्वास्थ्य सेवाओं के मोर्चे पर बिहार की स्थिति और भी चिंताजनक है।
- शिशु मृत्यु दर के मामले में बिहार 27वें स्थान पर है।
- स्वास्थ्य बीमा कवरेज के मामले में यह 29वें स्थान पर है।
- शौचालय सुविधा की दृष्टि से भी बिहार अंतिम स्थान पर है।
ये तथ्य दर्शाते हैं कि राज्य की स्वास्थ्य नीतियाँ जमीनी स्तर पर असरदार नहीं हो पाई हैं। स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच और बीमा योजनाओं की कम कवरेज गरीब वर्ग और ग्रामीण समाज को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है।
🧭 मानव विकास: ठहराव की स्थिति
राहुल गांधी ने अपने वक्तव्यों में मानव विकास के तीन स्तंभ — शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार — पर विशेष जोर दिया। परंतु वास्तविकता यह है कि बिहार इन तीनों क्षेत्रों में राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है। जब किसी राज्य का युवा ही अवसरों से वंचित हो जाए, तो विकास केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाता है।
🔍 निष्कर्ष: बदलाव की दिशा में जागृति
आज बिहार का युवा वर्ग पहले से कहीं अधिक जागरूक है। वह प्रश्न पूछ रहा है, व्यवस्था को चुनौती दे रहा है, और बदलाव की मांग कर रहा है — यही आशा की सबसे बड़ी किरण है। लेकिन इस जागरूकता को ठोस परिणामों में बदलने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, नीति सुधार और सामाजिक सहभागिता की जरूरत है।
बिहार को फिर से ज्ञान, रोजगार और मानवता का केंद्र बनाने के लिए शिक्षा में निवेश, उद्योगों का विकास, और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का प्रसार अनिवार्य है। यह केवल बिहार की नहीं, बल्कि भारत के समग्र विकास की शर्त है — क्योंकि कोई भी देश अपने सबसे कमजोर राज्य को पीछे छोड़कर मजबूत नहीं बन सकता।