
यरुशलम के माउंट स्कोपस पर स्थित हदासाह अस्पताल में 28 अक्टूबर की शाम एक भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला। इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनकी पत्नी सारा नेतन्याहू ने यहां ‘जॉन गेंडेल पुनर्वास केंद्र’ का उद्घाटन किया — एक ऐसा संस्थान जो युद्ध में घायल सैनिकों को न केवल उपचार देगा, बल्कि उन्हें जीवन का नया संबल भी प्रदान करेगा।
🇮🇱 साहस, समर्पण और पुनर्निर्माण की मिसाल
कार्यक्रम के दौरान नेतन्याहू ने उन सैनिकों से मुलाकात की जिन्होंने राष्ट्र की रक्षा करते हुए अपने शरीर का हिस्सा या स्वास्थ्य खो दिया, परंतु हिम्मत नहीं। प्रधानमंत्री ने कहा,
“इन योद्धाओं की आंखों में मैंने दर्द नहीं, दृढ़ संकल्प देखा। वे कहते हैं — ‘हम अपने देश के लिए फिर उठ खड़े होंगे।’”
यह वाक्य केवल सैनिकों की आत्मशक्ति का नहीं, बल्कि पूरे इज़राइल समाज की एकजुटता और अटूट मनोबल का परिचायक है।
🏥 चिकित्सा नहीं, जीवन पुनर्निर्माण का केंद्र
हदासाह अस्पताल का यह नया पुनर्वास केंद्र आधुनिक तकनीक, उच्चस्तरीय फिजियोथेरपी और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से सुसज्जित है। यहां घायल सैनिकों को न सिर्फ उपचार मिलेगा, बल्कि वे नई कौशल और आत्मविश्वास के साथ समाज में पुनः सक्रिय जीवन शुरू कर सकेंगे।
यह केंद्र यह संदेश देता है कि “घाव गहरे हों या कठिन समय, पुनर्जन्म हमेशा संभव है।”
🌄 माउंट स्कोपस: उम्मीद और गौरव का प्रतीक
अपने संबोधन में नेतन्याहू ने माउंट स्कोपस को इज़राइल की “विजय भावना का प्रतीक” बताया। उन्होंने कहा कि यह पर्वत अब केवल चिकित्सा का केंद्र नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय आत्मा का प्रतीक है जो हर बार संकट से उभरकर और अधिक प्रबल होती है।
📸 एकता और करुणा की झलकियाँ
कार्यक्रम की तस्वीरों में प्रधानमंत्री और सारा नेतन्याहू को घायल सैनिकों के साथ आत्मीयता से बातचीत करते देखा गया — कोई सैनिक व्हीलचेयर पर बैठा है, कोई डॉक्टरों के साथ खड़ा है, तो कोई नेतन्याहू से हाथ मिलाते हुए मुस्कुरा रहा है। यह दृश्य इज़राइल की “नई वीर पीढ़ी” का प्रतिबिंब है — वह पीढ़ी जो दर्द में भी देशभक्ति की रोशनी ढूंढ लेती है।
🌟 निष्कर्ष
यह उद्घाटन सिर्फ एक चिकित्सा संस्थान की शुरुआत नहीं थी, बल्कि इज़राइल की जुझारू आत्मा, राष्ट्रीय एकता और मानवता के प्रति उसके समर्पण का उत्सव था।
माउंट स्कोपस से उठती यह आशा की नई किरण अब पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणा बन चुकी है — यह विश्वास दिलाती है कि जब तक उम्मीद जीवित है, कोई घाव स्थायी नहीं होता।