
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में एक सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से भारतीय राजनीति के उस दर्दनाक पहलू को उजागर किया है, जिसे देश के किसान पिछले कई वर्षों से झेल रहे हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा —
“चाहे उत्तर प्रदेश का लखीमपुर हो या मध्य प्रदेश का गुना, अत्याचार और दमन की पद्धति एक जैसी है। भाजपा नेताओं ने सिर्फ किसानों को गाड़ियों से रौंदा ही नहीं, बल्कि उनकी खेती और आजीविका को भी कुचल दिया है।”
यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस गहरे सामाजिक संकट की ओर संकेत करता है जो ग्रामीण भारत की आत्मा को भीतर से तोड़ रहा है।
🌾 किसानों पर हिंसा: लोकतंत्र के चेहरे पर एक कलंक
लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) की घटना को देश आज भी भूला नहीं है, जहां आंदोलनरत किसानों को वाहन से कुचलने का आरोप एक भाजपा नेता के पुत्र पर लगा था। अब मध्य प्रदेश के गुना से आई खबरें — जिसमें एक किसान की हत्या और उसकी बेटियों के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया — उस घाव को फिर से ताज़ा कर देती हैं।
किसानों की यह पीड़ा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आर्थिक भी है। जब एक सरकार उन लोगों की सुरक्षा नहीं कर पाती जो देश की खाद्य रीढ़ हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है — क्या यह वही “अमृतकाल” है जिसकी बात सत्ता करती है?
🏛️ भूमि अधिग्रहण से लेकर ‘काले कानून’ तक — किसान असुरक्षित क्यों?
अखिलेश यादव ने अपने बयान में भूमि अधिग्रहण, काले कृषि कानूनों और किसानों की हत्याओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि भाजपा शासन में “अन्याय और अपमान की हर सीमा पार कर दी गई है।”
यह कथन सिर्फ एक विपक्षी टिप्पणी नहीं, बल्कि उस नीतिगत असंतुलन का प्रतीक है जो भारत के ग्रामीण समाज को लगातार हाशिए पर धकेल रहा है।
- भूमि अधिग्रहण के मामलों में किसानों को उचित मुआवज़ा न मिलना,
- कृषि कानूनों के विरोध में हुए देशव्यापी आंदोलन,
- और किसानों की आत्महत्याओं का बढ़ता आंकड़ा —
ये सभी घटनाएं एक गहरी प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करती हैं।
🤐 राजनीतिक चुप्पी और संवेदनहीनता
सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि ऐसे मामलों में सत्ता की प्रतिक्रिया अक्सर “राजनीतिक बचाव” के रूप में आती है, न कि “मानवीय संवेदना” के रूप में।
घटनाएं सामने आने के बाद भी शासन का ध्यान अपराधियों के दंड पर नहीं, बल्कि घटना को “राजनीतिक षड्यंत्र” बताने पर रहता है। यह प्रवृत्ति न केवल लोकतंत्र को कमजोर करती है, बल्कि पीड़ितों के न्याय की राह भी कठिन बना देती है।
💬 समाजवादी दृष्टिकोण और जनआवाज़ की प्रासंगिकता
अखिलेश यादव का यह वक्तव्य भले ही विपक्ष की राजनीति का हिस्सा हो, परंतु यह उस सच्चाई को रेखांकित करता है जिसे कोई भी ईमानदार नागरिक नकार नहीं सकता —
भारत में किसान आज भी “विकास” के नाम पर सबसे ज्यादा उत्पीड़ित वर्ग बन चुका है।
उनकी खेती पर नीतिगत प्रहार, उनकी बेटियों की असुरक्षा, और उनकी ज़मीन पर कब्जे — यह सब उस “नए भारत” की तस्वीर हैं जो केवल भाषणों में ही उज्जवल है।
🔚 निष्कर्ष: न्याय की मांग, राजनीति से ऊपर
गुना की यह घटना केवल एक प्रदेश की नहीं, बल्कि समूचे भारत के किसान समुदाय की चीख है।
अब समय आ गया है कि सत्ता, चाहे किसी भी दल की हो, किसान के अधिकारों और उसकी गरिमा को केंद्र में रखकर नीति बनाए।
क्योंकि —
“जब खेत जलते हैं, तो केवल किसान नहीं, पूरा राष्ट्र भूख से जलता है।”