
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जिसने विधि शोधकर्ताओं की लंबे समय से चली आ रही वेतन असमानता की समस्या को समाप्त कर दिया है। इस आदेश के तहत अब सभी विधि शोधकर्ताओं को अक्टूबर 2022 से ₹65,000 प्रतिमाह का वेतन दिया जाएगा। यह फैसला न केवल आर्थिक न्याय का प्रतीक है, बल्कि न्यायिक सेवा में कार्यरत युवाओं के परिश्रम को उचित मान्यता भी प्रदान करता है।
📜 पृष्ठभूमि: वर्षों पुरानी असमानता का अंत
लंबे समय से दिल्ली उच्च न्यायालय में कार्यरत विधि शोधकर्ताओं के वेतन में बड़ा अंतर देखने को मिलता था। मुख्य न्यायाधीश और कुछ न्यायाधीशों के अधीन कार्य करने वाले शोधकर्ताओं को ₹65,000 मिलते थे, जबकि अन्य पीठों में नियुक्त शोधकर्ताओं को मात्र ₹35,000 पर काम करना पड़ता था। यह स्थिति न केवल अनुचित थी, बल्कि समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत के भी विपरीत थी।
⚖️ याचिका और न्याय की पहल
इस भेदभाव के खिलाफ प्रथिबा एम. सिंह और रजनीश कुमार गुप्ता सहित कुछ शोधकर्ताओं ने अदालत में याचिका दाखिल की। उन्होंने यह तर्क दिया कि सभी विधि शोधकर्ता समान कार्य करते हैं—फिर वेतन में इतना अंतर क्यों?
मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए उचित समीक्षा का आदेश दिया और अंततः न्यायालय ने समान वेतन का निर्णय सुनाया।
💰 निर्णय का सार: समान कार्य, समान वेतन
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि सभी विधि शोधकर्ताओं का कार्य समान प्रकृति का है, इसलिए उनके वेतन में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। अब सभी को ₹65,000 प्रति माह का वेतन मिलेगा, जो अक्टूबर 1, 2022 से प्रभावी माना जाएगा। यह फैसला आर्थिक दृष्टि से राहत देने के साथ-साथ न्यायिक संस्थाओं में पारदर्शिता और समानता को भी प्रोत्साहित करता है।
👩⚖️ निर्णय के व्यापक परिणाम
- यह फैसला न्यायपालिका में समान अवसर की भावना को सशक्त करता है।
- विधि शोधकर्ताओं को उनके परिश्रम और बौद्धिक योगदान के अनुरूप मान्यता मिलती है।
- अन्य न्यायिक संस्थानों के लिए यह निर्णय एक नजीर (precedent) के रूप में काम करेगा।
- यह युवाओं में न्यायिक सेवाओं के प्रति विश्वास और आकर्षण दोनों बढ़ाएगा।
🔍 निष्कर्ष: न्याय में समानता की जीत
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय साबित करता है कि जब अन्याय या असमानता के खिलाफ आवाज उठाई जाती है, तो न्याय व्यवस्था स्वयं सुधार की दिशा में आगे बढ़ती है।
यह फैसला उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो कानून के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। विधि शोधकर्ताओं को मिला यह नया सम्मान न केवल उनके परिश्रम की स्वीकृति है, बल्कि न्यायिक प्रणाली के भीतर समानता, पारदर्शिता और सम्मान की नई परिभाषा भी स्थापित करता है।