
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में चुनाव आयोग द्वारा 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में शुरू किए गए “विशेष गहन पुनरीक्षण” (Special Intensive Revision – SIR) के दूसरे चरण पर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब “हर असली मतदाता” का नाम सूची में सुरक्षित रहे।
🔍 विशेष गहन पुनरीक्षण क्या है?
चुनाव आयोग ने देश के कई हिस्सों में मतदाता सूची की दोबारा समीक्षा शुरू की है, जिसे “विशेष गहन पुनरीक्षण” कहा गया है। इस प्रक्रिया में नागरिकों की पहचान और पात्रता की नई जांच की जा रही है। बताया जा रहा है कि इस पुनरीक्षण के दौरान NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) और NPR (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) जैसे दस्तावेजों का उल्लेख भी किया गया है, जिससे लोगों में असमंजस और भय का माहौल बन गया है।
🗣️ ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस कदम को “लोकतांत्रिक भावनाओं के विपरीत” बताया और कहा कि यह प्रक्रिया उन नागरिकों को हाशिए पर धकेल सकती है, जो पीढ़ियों से इस देश का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने कहा—
“भारत का हर सच्चा मतदाता अपने अधिकार का हकदार है। मतदाता सूची से किसी को भी मनमाने तरीके से बाहर करना संविधान की भावना के खिलाफ है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि NRC और NPR जैसे दस्तावेजों के आधार पर पहचान तय करना नागरिक स्वतंत्रता और समान अधिकार के सिद्धांतों को कमजोर करता है।
👥 राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
टीएमसी के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी चुनाव आयोग की इस पहल पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया “राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित” प्रतीत होती है, जो समाज के कमजोर और अल्पसंख्यक तबकों को प्रभावित कर सकती है।
वहीं विपक्षी दलों ने इसे “छिपा हुआ बहिष्करण अभियान” बताते हुए पारदर्शिता पर संदेह जताया है।
📋 चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि यह कदम केवल मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है। आयोग के अनुसार, नागरिकों को अपने दस्तावेज प्रस्तुत करने, सुधार कराने और आपत्तियाँ दर्ज करने का पूरा अवसर दिया जाएगा।
अंतिम मतदाता सूची दिसंबर 2025 तक प्रकाशित किए जाने की संभावना है।
🧭 लोकतंत्र की दिशा पर सवाल
इस पूरी प्रक्रिया ने लोकतंत्र की विश्वसनीयता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा पर नई बहस छेड़ दी है। क्या भारत का लोकतंत्र वाकई अपने हर नागरिक की आवाज को समान रूप से सुन पा रहा है?
ममता बनर्जी के हालिया वक्तव्य ने इस बहस को और तेज कर दिया है—विशेषकर ऐसे समय में जब देश 2026 के आम चुनावों की ओर बढ़ रहा है और हर राजनीतिक दल मतदाता आधार को मजबूत करने में जुटा है।