
भारत के रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह 1 नवम्बर 2025 को मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर के लिए रवाना हो गए हैं, जहाँ वे 12वीं आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस (ADMM-Plus) में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। यह यात्रा भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच रक्षा सहयोग को नई दिशा देने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
🔷 ADMM-Plus क्या है?
ADMM-Plus (ASEAN Defence Ministers’ Meeting Plus) एक प्रमुख बहुपक्षीय मंच है, जिसमें आसियान (ASEAN) के 10 सदस्य देशों के साथ-साथ 8 प्रमुख साझेदार देश—भारत, अमेरिका, चीन, रूस, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं।
इस मंच का उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा, रणनीतिक विश्वास, आपसी सहयोग और शांति-स्थापना के लिए सदस्य देशों के बीच रक्षा संवाद और साझेदारी को प्रोत्साहित करना है।
🔷 भारत के लिए इस बैठक का महत्व
भारत के लिए यह बैठक केवल एक औपचारिक कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” को सशक्त करने का अवसर भी है।
राजनाथ सिंह की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाओं की स्थिरता जैसे मुद्दे केंद्र में हैं। इस संदर्भ में भारत का दृष्टिकोण “सुरक्षित, स्वतंत्र और समावेशी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र” की अवधारणा पर आधारित है।
🔷 संभावित चर्चाएँ और एजेंडा
बैठक के दौरान सदस्य देशों के बीच निम्नलिखित विषयों पर विचार-विमर्श होने की संभावना है—
- समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक सहयोग
- आपदा प्रबंधन एवं मानवीय सहायता
- साइबर सुरक्षा और तकनीकी समन्वय
- आतंकवाद-रोधी रणनीतियाँ
- रक्षा उद्योग में परस्पर निवेश और अनुसंधान
भारत इन सभी मुद्दों पर अपने अनुभव साझा करेगा और क्षेत्र में सामूहिक सुरक्षा तथा संतुलित रक्षा सहयोग को प्रोत्साहित करने पर बल देगा।
🔷 भारत-मलेशिया संबंधों में नई ऊर्जा
राजनाथ सिंह की इस यात्रा से भारत और मलेशिया के द्विपक्षीय रक्षा संबंधों में भी नई गति आने की संभावना है।
दोनों देश पहले से ही संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान और समुद्री सहयोग के क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। यह बैठक इन साझेदारियों को और गहराई देने का अवसर प्रदान करेगी।
🔷 निष्कर्ष
राजनाथ सिंह की मलेशिया यात्रा न केवल भारत की आसियान के साथ रणनीतिक साझेदारी को सुदृढ़ करेगी, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को भी पुनः रेखांकित करेगी।
भारत का यह प्रयास “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना के अनुरूप है—जहाँ सहयोग, सुरक्षा और संवाद के माध्यम से साझा प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।