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बिहार बनाम गुजरात: उद्योगों के मुद्दे पर तेजस्वी यादव का सियासी वार


बिहार की राजनीति में एक बार फिर उद्योग और निवेश का मुद्दा गरमाया हुआ है। राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने भाजपा और केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा है कि “भाजपा बिहार से वोट लेती है, लेकिन उद्योग गुजरात में बसाती है।” यह बयान न केवल एक राजनीतिक टिप्पणी है, बल्कि बिहार के आर्थिक भविष्य पर गंभीर सवाल भी खड़ा करता है।

🔹 बिहार की जनता – वोट बैंक या विकास भागीदार?

तेजस्वी यादव का कहना है कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बिहार को केवल चुनावी वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि “बिहार के लोगों को नौकरी और उद्योग के नाम पर केवल वादे दिए गए, जबकि असल निवेश गुजरात और अन्य राज्यों में जा रहा है।”
उन्होंने यह भी कहा कि जब गुजरात के उद्योगपतियों को बिहार में भूमि और सुविधाएं दी जाती हैं, तब स्थानीय व्यापारियों और उद्यमियों की उपेक्षा की जाती है। यह बयान बिहार में औद्योगिक नीति की पारदर्शिता और स्थानीय युवाओं के हितों पर बहस को फिर से जीवित कर गया है।

🔹 अमित शाह के वादे और तेजस्वी की चुनौती

तेजस्वी यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस दावे पर भी सवाल उठाया जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा बिहार को “देश का अग्रणी राज्य” बनाएगी। तेजस्वी ने पलटवार करते हुए कहा, “अगर बिहार को नंबर वन बनाना है, तो उद्योग गुजरात में क्यों लगाए जा रहे हैं?”
उन्होंने 2020 विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा किए गए वादों की याद दिलाई और कहा कि अब तक उनमें से अधिकांश अधूरे हैं। तेजस्वी का यह भी कहना था कि भाजपा ने अभी तक 2025 के चुनाव के लिए अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित न करके जनता को भ्रमित किया है।

🔹 स्थानीय निवेश बनाम बाहरी पूंजी

राजद नेता ने यह भी दावा किया कि केंद्र सरकार द्वारा गुजरात के उद्योगपतियों को बिहार में भारी निवेश के नाम पर आमंत्रित किया जा रहा है, जबकि उनकी कंपनियों की वास्तविक पूंजी वादों के मुकाबले बेहद कम है। उन्होंने सवाल उठाया कि “क्या बिहार के स्थानीय उद्योगपतियों को जानबूझकर किनारे किया जा रहा है?”
यह विवाद बिहार के युवाओं के बीच विशेष रूप से गूंज रहा है, जो रोजगार और उद्यमशीलता के अवसरों की तलाश में अपने ही राज्य से पलायन करने को मजबूर हैं।

🔹 चुनावी शस्त्र या विकास का संवाद?

तेजस्वी यादव का यह बयान केवल एक राजनीतिक हमला नहीं है, बल्कि यह राज्य के विकास मॉडल पर एक गहन विमर्श भी है। यह प्रश्न उठाता है कि क्या बिहार को विकास की दौड़ में पीछे रखने वाली नीतियाँ वास्तव में “आर्थिक केंद्रीकरण” का परिणाम हैं?
यदि उद्योगों की स्थापना और निवेश का केंद्र केवल कुछ राज्यों तक सीमित रहेगा, तो क्या संघीय ढाँचा संतुलित रह पाएगा?

🔹 निष्कर्ष: बिहार की दिशा कौन तय करेगा?

आगामी 2025 विधानसभा चुनाव बिहार के लिए केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि विकास की नई सोच तय करने का समय है।
तेजस्वी यादव के बयानों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले चुनाव में मुद्दे केवल जातीय समीकरणों या गठबंधनों तक सीमित नहीं रहेंगे — बल्कि विकास, रोजगार और क्षेत्रीय समानता जैसी बातें अब केंद्र में होंगी।
बिहार की जनता अब वादों से आगे बढ़कर यह देखना चाहती है कि उनके वोट का परिणाम उनके राज्य की तरक्की में कब दिखाई देगा।


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