
🔹 प्रस्तावना
अफ्रीकी महाद्वीप का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश नाइजीरिया आज गहरी धार्मिक विभाजन रेखाओं से जूझ रहा है। ईसाई समुदाय पर बढ़ते हमले न केवल देश की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि यह विश्व स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के लिए भी एक गंभीर खतरे के रूप में उभर रहे हैं।
🔹 नाइजीरिया की वर्तमान स्थिति
नाइजीरिया में मुसलमान और ईसाई समुदाय लगभग समान अनुपात में निवास करते हैं, लेकिन उत्तर और मध्य भागों में चरमपंथी संगठनों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
- बोको हराम और फ़ुलानी चरवाहा मिलिशिया जैसे उग्रवादी समूह नियमित रूप से ईसाई बहुल इलाकों को निशाना बनाते हैं।
- गाँवों में आगजनी, चर्चों पर हमले और सामूहिक हत्याएँ वहाँ की भयावह वास्तविकता बन चुकी हैं।
- इन हिंसक घटनाओं ने न केवल सैकड़ों निर्दोष जानें ली हैं, बल्कि लाखों लोगों को विस्थापित भी किया है।
यह स्थिति अब केवल एक स्थानीय संघर्ष नहीं रही, बल्कि यह धार्मिक असहिष्णुता के वैश्विक खतरे का प्रतीक बन चुकी है।
🔹 अमेरिका की प्रतिक्रिया और कूटनीतिक संकेत
अमेरिका ने नाइजीरिया की स्थिति पर बार-बार चिंता जताई है।
- अमेरिकी सीनेटर मार्को रुबियो ने हाल में कहा कि “नाइजीरिया में ईसाई समुदाय पर हो रहा अत्याचार अस्वीकार्य है, और अमेरिका को इस पर मौन नहीं रहना चाहिए।”
- वहीं, पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने बयान में यह स्पष्ट किया कि अमेरिका “ऐसे अपराधों को रोकने के लिए तैयार, सक्षम और प्रतिबद्ध” है।
इन वक्तव्यों से यह साफ झलकता है कि अमेरिका अपने विदेश नीति एजेंडे में धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को पुनः प्राथमिकता देने की दिशा में बढ़ रहा है।
🔹 अंतरराष्ट्रीय राजनीति का आयाम
नाइजीरिया अफ्रीका का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है, और उसकी स्थिरता सीधे तौर पर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी है।
- अमेरिका का सक्रिय रुख मानवीय संवेदना से प्रेरित होने के साथ-साथ रणनीतिक हितों से भी जुड़ा है।
- यदि नाइजीरिया में चरमपंथी हिंसा और अस्थिरता बनी रही, तो यह पूरे पश्चिमी अफ्रीका क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों पर भी गहरा असर पड़ेगा।
अतः यह स्पष्ट है कि अमेरिका की चिंता केवल मानवीय नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
🔹 मानवीय और नैतिक दृष्टिकोण
धार्मिक स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक और अविच्छेद्य अधिकार है।
- नाइजीरिया में ईसाइयों पर हो रहे हमले केवल धार्मिक उत्पीड़न नहीं, बल्कि मानवता पर सीधा प्रहार हैं।
- अंतरराष्ट्रीय समुदाय को केवल निंदा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि राहत कार्यों, संवाद और सुरक्षा सहायता के ठोस कदम उठाने चाहिए।
- संयुक्त राष्ट्र, अफ्रीकी संघ और यूरोपीय साझेदारों को इस दिशा में समन्वित नीति बनानी होगी।
🔹 निष्कर्ष
नाइजीरिया की त्रासदी हमें यह याद दिलाती है कि जब किसी समाज में असहिष्णुता और कट्टरपंथ को बढ़ने दिया जाता है, तो उसका असर सीमाओं से परे फैलता है।
अमेरिका और अन्य शक्तिशाली राष्ट्रों की ज़िम्मेदारी है कि वे केवल राजनीतिक बयान न दें, बल्कि व्यावहारिक स्तर पर हस्तक्षेप करें — चाहे वह मानवीय सहायता के माध्यम से हो या अंतरराष्ट्रीय दबाव के जरिये।
नाइजीरिया में ईसाइयों पर हो रहे अत्याचार केवल एक देश का संकट नहीं, बल्कि मानवता की साझा चेतावनी है। इस चेतावनी को अनसुना करना भविष्य में और गहरी विभाजन रेखाएँ खींच सकता है।