
अमेरिका की राजनीति और मीडिया जगत का रिश्ता हमेशा से टकराव और आकर्षण के बीच झूलता रहा है। हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में एमएसएनबीसी (MSNBC) और उसके लोकप्रिय शो होस्ट जो स्कारबरो को निशाने पर लिया। उन्होंने चैनल की गिरती रेटिंग्स पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह शो अब “डाउन द ट्यूब्स” जा चुका है — यानी पूरी तरह नीचे गिर रहा है। ट्रंप ने इसे “देखने लायक खूबसूरत नज़ारा” बताया। इस बयान ने न सिर्फ मीडिया जगत में हलचल मचा दी, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का नया दौर शुरू कर दिया।
📰 रेटिंग्स बनाम राजनीति: मीडिया की साख पर सवाल
- रेटिंग्स की अहमियत: अमेरिकी मीडिया इंडस्ट्री में किसी चैनल या शो की रेटिंग्स उसकी लोकप्रियता और आर्थिक सफलता का पैमाना होती हैं। विज्ञापन राजस्व और प्रभाव दोनों इन्हीं पर निर्भर करते हैं।
- राजनीतिक ध्रुवीकरण: ट्रंप और एमएसएनबीसी के बीच लंबे समय से वैचारिक टकराव रहा है। चैनल को अक्सर “ट्रंप-विरोधी” कहा जाता है, जबकि ट्रंप लगातार इसे “फेक न्यूज़” कहकर इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहे हैं।
- जनमानस की धारणा: जब कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा मीडिया की गिरती रेटिंग्स पर टिप्पणी करता है, तो यह सिर्फ व्यंग्य नहीं बल्कि जनता के बीच मीडिया की साख और भरोसे पर सीधा असर डालता है।
🔍 विश्लेषण: क्या रेटिंग्स ही पत्रकारिता की कसौटी हैं?
- गुणवत्ता बनाम लोकप्रियता: किसी शो की रेटिंग्स घटने का मतलब यह नहीं कि उसकी पत्रकारिता कमजोर है। अक्सर गहराई वाले और विश्लेषणात्मक कार्यक्रम कम दर्शक पाते हैं, जबकि हल्के-फुल्के मनोरंजन शो अधिक लोकप्रिय हो जाते हैं।
- डिजिटल क्रांति का असर: आज दर्शक केवल टीवी तक सीमित नहीं हैं। यूट्यूब, पॉडकास्ट, एक्स (ट्विटर) और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी लोग बड़ी संख्या में समाचार सामग्री देख-सुन रहे हैं।
- राजनीतिक रणनीति: ट्रंप की टिप्पणी को केवल मीडिया आलोचना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चाल के रूप में भी देखा जा सकता है। यह उनके समर्थकों के बीच यह संदेश मजबूत करती है कि “मुख्यधारा मीडिया” अब जनता की नज़र में अपनी पकड़ खो रहा है।
🌍 वैश्विक दृष्टिकोण
यह परिघटना सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। दुनियाभर में राजनीति और मीडिया के बीच इसी तरह की खींचतान देखी जाती है। भारत, ब्रिटेन या यूरोप—हर जगह नेता चैनलों की टीआरपी, एजेंडा और निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं। यह प्रवृत्ति दिखाती है कि लोकतंत्र में मीडिया और सत्ताधारी वर्ग के बीच संवाद और संघर्ष — दोनों का सह-अस्तित्व बना रहेगा।
✍️ निष्कर्ष
डोनाल्ड ट्रंप की हालिया टिप्पणी अमेरिकी मीडिया और राजनीति के बीच पुरानी तनातनी का नया अध्याय है। रेटिंग्स चाहे गिरें या बढ़ें, असली चुनौती वही है — क्या मीडिया जनता को तथ्यपूर्ण, निष्पक्ष और जिम्मेदार पत्रकारिता प्रदान कर पा रहा है?
लोकतंत्र की नींव सिर्फ सत्ता या विपक्ष से नहीं, बल्कि सच्ची और विश्वसनीय जानकारी से मजबूत होती है।