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📰 पत्रकारिता, राजनीति और नैतिकता का पतन : अखिलेश यादव की टिप्पणी पर एक विचार


भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता को हमेशा से जनता की आवाज़ और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है। इसका काम सिर्फ़ ख़बर देना नहीं, बल्कि सत्य, निष्पक्षता और नैतिक मूल्यों के साथ समाज को दिशा दिखाना भी है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने एक बयान में पत्रकारिता और राजनीति में बढ़ती नैतिक गिरावट पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

🔍 घटना और अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया

अखिलेश यादव ने उन मीडिया संस्थानों और पत्रकारों की आलोचना की जो हत्या जैसी गंभीर घटनाओं को “मृत्यु” या “दुर्घटना” कहकर हल्का बना देते हैं। उनका कहना था कि जब पत्रकार सच्चाई को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं और राजनीतिक दल ऐसी घटनाओं को “छिटपुट मामला” बताकर नज़रअंदाज़ करते हैं, तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार है।
उन्होंने इस स्थिति को “कलियुग की पत्रकारिता” कहा — एक ऐसा दौर जहाँ नैतिकता और जिम्मेदारी धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।

🕊️ पत्रकारिता का धर्म

⚖️ राजनीति और नैतिक उत्तरदायित्व

🧠 समाज पर प्रभाव

🪞 निष्कर्ष

अखिलेश यादव की टिप्पणी केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गिरती सेहत पर एक सार्थक चेतावनी है।
पत्रकारिता को चाहिए कि वह सत्य और जिम्मेदारी की राह पर अडिग रहे, जबकि राजनीति को नैतिकता और जवाबदेही का मार्ग अपनाना होगा।
लोकतंत्र की सच्ची शक्ति तभी कायम रह सकती है जब पत्रकारिता निष्पक्ष और राजनीति नैतिक मूल्यों पर आधारित हो।


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